भारत में महंगाई को काबू में रखने के लिए अपनाए गए 'Flexible Inflation Targeting' के 10 साल पूरे हो गए हैं। अगस्त में रिटेल महंगाई **4.82%** पर पहुंचने के बाद अब बाजार की नजरें **5-7 अक्टूबर** को होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक पर टिकी हैं, जहां **25 बेसिस पॉइंट** की ब्याज दर वृद्धि की आशंका जताई जा रही है।
महंगाई का नया टेस्ट और MPC का रुख
अक्टूबर 2016 में RBI ने 'Flexible Inflation Targeting' (FIT) को अपनाया था, जिसका मकसद 4% का CPI टारगेट हासिल करना है (जिसमें 2% से 6% की टॉलरेंस लिमिट दी गई है)। पिछले एक दशक में इस फ्रेमवर्क ने बाजार की उम्मीदों को स्थिर रखा है, लेकिन अब यह एक नई चुनौती का सामना कर रहा है।
अगस्त 2026 में रिटेल महंगाई 4.82% दर्ज की गई, जो लगातार तीसरे महीने 4% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस दबाव को कम करने के लिए MPC अपनी अगली बैठक में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% तक ले जा सकती है।
सरकार का नया मैंडेट और चुनौतियां
सरकार ने हाल ही में इस पॉलिसी को मार्च 2031 तक के लिए बढ़ा दिया है, ताकि इकोनॉमी में निरंतरता बनी रहे। हालांकि, मौजूदा ग्लोबल और घरेलू हालात इसे जटिल बना रहे हैं। क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों और फूड सप्लाई चेन में आ रही अड़चनों की वजह से महंगाई को कंट्रोल करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
निवेशकों के लिए संकेत
ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सीधा असर कंपनियों के मार्जिन और आम लोगों की लोन ईएमआई (EMI) पर पड़ता है। बाजार की नजर अब इस बात पर है कि RBI का रुख भविष्य को लेकर कैसा रहता है और वे कब तक महंगाई को वापस 4% के टारगेट पर लाने की उम्मीद जताते हैं।
