भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव की बड़ी वजह सिर्फ FII की बिकवाली नहीं, बल्कि लार्ज-कैप कंपनियों की पिछले **2** सालों से रुकी हुई अर्निंग ग्रोथ है। एक्सपर्ट्स अब इंडेक्स की जगह मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टरों में मौके तलाशने की सलाह दे रहे हैं।
भारतीय इक्विटी मार्केट में इस समय काफी हलचल है और बेंचमार्क इंडेक्स निवेशकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि इसके पीछे फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) की बिकवाली एक प्रमुख कारण है, लेकिन असल समस्या कहीं ज्यादा गहरी है। पिछले 24 महीनों में लार्ज-कैप कंपनियों की सुस्त अर्निंग ग्रोथ ने मार्केट की तेजी की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।
लार्ज-कैप की सुस्ती और उसका असर
जब देश की सबसे बड़ी कंपनियां अपना मुनाफा नहीं बढ़ा पातीं, तो इंडेक्स के लिए ऊपर जाना मुश्किल हो जाता है। पिछले दो सालों में इन दिग्गज कंपनियों ने ग्लोबल डिमांड में कमी और इंटरनल कॉस्ट प्रेशर जैसे तमाम चुनौतियों का सामना किया है। बाजार का यह 'रेंज-बाउंड' रहना इस बात का संकेत है कि शेयर की कीमतें अंततः कंपनी की कमाई के पीछे ही चलती हैं। अगर नेट प्रॉफिट नहीं बढ़ेगा, तो इंडेक्स का प्रदर्शन भी सीमित रहेगा।
नई रणनीति: मैन्युफैक्चरिंग और Capex पर दांव
Nifty जैसे इंडेक्स की सुस्ती के बीच निवेशकों का ध्यान अब पुराने सेक्टरों से हटकर उन क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रहा है जो भविष्य की ग्रोथ इंजन हो सकते हैं। सरकार के मैन्युफैक्चरिंग पुश और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते खर्च (Capex) की बदौलत अब इंडस्ट्रियल फर्म्स से नई उम्मीदें जग रही हैं। आने वाले समय में बाजार के नए विनर्स वो कंपनियां होंगी जो देश की फिजिकल और डिजिटल क्षमता को मजबूत कर रही हैं।
जोखिम और सतर्कता
इस बदलाव के साथ कुछ रिस्क भी जुड़े हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में समय और लागत बढ़ने (Cost Overruns) का डर हमेशा रहता है, और भारी Capex के लिए कंपनियों के कर्ज पर नजर रखना भी जरूरी है। निवेशकों को सलाह है कि वे रोजाना के इंडेक्स उतार-चढ़ाव के बजाय अब कंपनियों के बैलेंस शीट, डेट लेवल और प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन पर ज्यादा गौर करें। यही वो पैरामीटर्स हैं जो लंबी अवधि में सही वैल्यू तलाशने में मदद करेंगे।
