Annual Survey of Industries (ASI) 2024-25 के ताजा आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। देश की मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जबरदस्त एकाधिकार (Concentration) दिख रहा है, जहां महज **3.6%** कंपनियां कुल आउटपुट का **62%** हिस्सा संभाल रही हैं।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ती खाई
नवंबर 2026 में जारी हुए एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज (ASI) के डेटा से पता चलता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का ढांचा ऊपर से भारी (top-heavy) होता जा रहा है। हालांकि, ब्रॉडर इंडस्ट्रियल सेक्टर ने अच्छा प्रदर्शन किया है और ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) 9.59% बढ़कर ₹26.94 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है, लेकिन डेटा की गहराई में एक बड़ा स्ट्रक्चरल डिवाइड नजर आता है।
बड़े बनाम छोटे खिलाड़ी
आंकड़े बताते हैं कि बड़ी कंपनियों का सेक्टर पर पूरी तरह दबदबा है। जिन फैक्ट्रियों में प्लांट और मशीनरी का निवेश ₹10 करोड़ से ज्यादा है, उनके पास कुल फिक्स्ड कैपिटल का लगभग 87% हिस्सा है। इसके विपरीत, ₹5 करोड़ तक निवेश वाली छोटी इकाइयां कुल फैक्ट्रियों का 79% तो हैं, लेकिन फिक्स्ड कैपिटल में उनका योगदान मात्र 10.6% है।
निवेश में आई सुस्ती (GFCF Decline)
निवेशकों के लिए सबसे चिंताजनक संकेत 'ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन' (GFCF) में आई 8% की गिरावट है। FY21 के बाद यह पहली बार है जब इसमें कमी आई है। इसका सीधा मतलब यह है कि भले ही कंपनियां मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा इस्तेमाल कर रही हैं और रोजगार में 7.19% का इजाफा (कुल 2.10 करोड़ लोग) हुआ है, लेकिन नई फैक्ट्रियां लगाने को लेकर कंपनियां अब फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं।
भौगोलिक एकाधिकार (Geographic Concentration)
रिपोर्ट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग GVA का 54% से अधिक हिस्सा केवल पांच राज्यों—महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश से आता है। यह दर्शाता है कि औद्योगिक विकास अभी भी देश के कुछ हिस्सों तक ही सीमित है, जो भविष्य के लिए लॉजिस्टिक चुनौतियों का सबब बन सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह 8% की गिरावट ग्लोबल अनिश्चितता के कारण है या फिर कंपनियां नई कैपेसिटी के बजाय ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर ध्यान दे रही हैं। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर खास नजर रखने की जरूरत है।
