India M&A Deals: डील की संख्या में **20%** की बड़ी गिरावट, अब 'बड़े दांव' पर कंपनियों का फोकस

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India M&A Deals: डील की संख्या में **20%** की बड़ी गिरावट, अब 'बड़े दांव' पर कंपनियों का फोकस

साल 2026 के पहले सात महीनों में इंडिया में M&A (मर्जर और एक्विजिशन) गतिविधियों में **20%** की कमी आई है। कंपनियां अब छोटे सौदों के बजाय बड़े रणनीतिक निवेश (Strategic Bets) को प्राथमिकता दे रही हैं, जिससे बड़े सौदों पर शेयरहोल्डर रिटर्न बढ़कर **3.7%** हो गया है।

भारतीय कॉर्पोरेट जगत में साल 2026 के शुरुआती सात महीनों में रणनीतिक बदलाव देखने को मिला है। पिछले साल के मुकाबले डील वॉल्यूम में 20% की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, इसे बाजार की कमजोरी नहीं माना जा रहा, बल्कि यह कंपनियों की बदलती अप्रोच है। अब कंपनियां छोटे और कई सौदे करने के बजाय बड़े और हाई-कनविक्शन वाले ट्रांजेक्शंस पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उद्देश्य है सीधे स्केल (Scale) हासिल करना और नई टेक्नोलॉजी पर पकड़ बनाना।

निवेशकों को मिला फायदा

इस नई रणनीति का सीधा असर शेयरहोल्डर्स को मिल रहे रिटर्न पर दिखा है। बड़े सौदों में अब 3.7% का मीडियन 30-डे रिलेटिव रिटर्न मिल रहा है, जो पिछले दो सालों में छोटे सौदों से मिले कमजोर रिटर्न के मुकाबले एक बड़ा रिकवरी संकेत है।

विदेशी बाजारों पर नजर (Outbound Strategy)

इस ट्रेंड का सबसे अहम हिस्सा 'आउटबाउंड एक्विजिशन' है। भारतीय कंपनियां विदेश में एसेट्स खरीदने के लिए आक्रामक हो गई हैं, जिसका कुल मूल्य $3.8 बिलियन बढ़ गया है। अब सिर्फ दिग्गज कंपनियां ही नहीं, बल्कि मिड-साइज कंपनियां भी टेक्निकल एक्सपर्टीज और ग्लोबल सप्लाई चेन में जगह बनाने के लिए विदेशों का रुख कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर, इनबाउंड डील वैल्यू में $3.7 बिलियन की कमी आई है, जो यह दर्शाता है कि विदेशी निवेशक अब इंडियन मार्केट में अपनी भागीदारी को दोबारा तौल रहे हैं।

सेक्टर में बदलाव

सॉफ्टवेयर और SaaS सेक्टर में डील एक्टिविटी धीमी पड़ी है। अब निवेशक उन सेक्टर्स पर दांव लगा रहे हैं जो ज्यादा 'टेंजिबल' (Tangible) हैं। इसमें सेमीकंडक्टर्स, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर-लिंक्ड प्रोजेक्ट्स शामिल हैं।

निवेशकों के लिए चेतावनी

बेशक ये सौदे बड़े हैं, लेकिन इनमें जोखिम भी ज्यादा है। नई कंपनियों को इंटीग्रेट करने की चुनौती, कर्ज (Debt) के जरिए फंडिंग का बोझ, और विदेशी करेंसी का जोखिम निवेश पर असर डाल सकता है। निवेशकों को अब यह ट्रैक करना होगा कि क्या इन बड़ी डील से कंपनियों की मार्जिन और एफिशिएंसी में वाकई सुधार आ रहा है या बैलेंस शीट पर कर्ज का दबाव बढ़ रहा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.