भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि चीन के साथ व्यापार और निवेश पर लगी पाबंदियां तब तक जारी रहेंगी जब तक बॉर्डर पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता। इसका सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जो चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं।
भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर स्थिति स्थिर होने तक चीन के लिए व्यापार रियायतों या फॉरेन इन्वेस्टमेंट के नियमों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। सरकार का यह रुख जारी है, जिसका मतलब है कि निवेशकों और बिजनेस जगत के लिए मौजूदा ट्रेड एनवायरनमेंट में कोई बदलाव नहीं होने वाला है।
व्यापार का आंकड़ा और चुनौतियां
फाइनेंशियल ईयर 2026 में दोनों देशों के बीच कुल बाइलैटरल ट्रेड $151 बिलियन रहा, जिसमें से $131.6 बिलियन का सामान चीन से भारत आया। यह ट्रेड डेफिसिट सरकार के लिए चिंता का विषय है। बीजिंग की रिस्ट्रिक्टिव एक्सपोर्ट पॉलिसी के कारण रेयर अर्थ मिनरल्स और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी कंपोनेंट्स की सप्लाई को लेकर भी चुनौतियां बनी हुई हैं।
निवेश पर सख्त निगरानी
भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के लिए सरकार की सिक्योरिटी क्लीयरेंस अनिवार्य बनी रहेगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि बॉर्डर पर शांति ही किसी भी बड़े आर्थिक सहयोग की पहली शर्त है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
फार्मास्युटिकल्स, सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर की कई भारतीय कंपनियां अभी भी कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। मौजूदा पॉलिसी में बदलाव न होने का मतलब है कि इन कंपनियों को सप्लाई चेन रिस्क और लागत के दबाव को खुद मैनेज करना होगा। सरकार अब 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीमों के जरिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रही है ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके।
