चीन से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को लेकर भारत ने अपनी सतर्क नीति बरकरार रखी है। सरकार ने साफ कर दिया है कि बाजार में निवेश नियमों को और आसान बनाने का फैसला पूरी तरह से सीमा विवादों के समाधान और शांति बहाली पर टिका है। सभी की निगाहें अब आगामी BRICS समिट पर टिकी हैं।
भारत सरकार की विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नीति अब सीधे तौर पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर शांति से जुड़ गई है। भले ही सरकार आर्थिक सहयोग के लिए तैयार दिखती है, लेकिन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि निवेश नियमों में कोई भी बड़ी राहत तभी मिलेगी जब सीमा पर चल रहे तनाव को ठोस तरीके से हल किया जाएगा। जो निवेशक 2020 से पहले वाली स्थिति की उम्मीद कर रहे हैं, उनके लिए फिलहाल प्रक्रिया धीमी और कड़ी जांच वाली ही बनी रहेगी।
रेगुलेटरी बदलाव और हकीकत
मार्च 2026 में सरकार ने 'प्रेस नोट 3' में आंशिक संशोधन किया था, जिसके तहत पड़ोसी देशों से 10% तक की नॉन-कंट्रोलिंग ओनरशिप के लिए ऑटोमैटिक रूट की अनुमति दी गई। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 60 दिन की प्रोसेसिंग समय सीमा भी तय की गई। हालांकि, अगस्त 2026 के डेटा से पता चलता है कि इसका फायदा मॉरीशस, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों को मिला है, न कि सीधे चीन को। यह सरकार के चयनात्मक (Selective) नजरिए को दिखाता है।
BRICS समिट और उम्मीदें
अगस्त 2026 में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता में 8 सूत्रीय सहमति बनी थी। अब दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को होने वाला BRICS समिट एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। समिट से निकलने वाले नतीजों से यह साफ होगा कि क्या सरकार अपनी सेक्टर-आधारित मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी को जारी रखेगी या निवेश प्रोटोकॉल में बदलाव करेगी।
आर्थिक चुनौतियां
भारत के सामने चुनौती बड़ी है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में चीन के साथ भारत का ट्रेड डेफिसिट $112 बिलियन रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर एनर्जी जैसे सेक्टर में भारी आयात होने के बावजूद, सरकार सुरक्षा चिंताओं से समझौता करने के मूड में नहीं है। निवेशकों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा रिस्क बॉर्डर पर होने वाली अस्थिरता है, क्योंकि किसी भी तनाव की स्थिति में निवेश मंजूरी के नियम तुरंत सख्त किए जा सकते हैं।
