भारत सरकार ने नेशनल अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग स्कीम (NATS) के तहत 2026-27 के लिए अपने लक्ष्य को बढ़ाकर **600,000** छात्र कर दिया है। यह **40%** की बढ़ोतरी **₹1,250 करोड़** के बजट के समर्थन से आई है। इस कदम का मकसद **5.5%** युवा बेरोज़गारी दर से निपटना और शिक्षा व उद्योग के बीच स्किल गैप को पाटना है।
अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण का बढ़ा दायरा
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नेशनल अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग स्कीम (NATS) के तहत अप्रेंटिसशिप के लक्ष्य में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा किया है। अब 600,000 छात्रों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है, जो पिछले साल के 428,000 के आंकड़े से 40% ज़्यादा है। इस पहल को गति देने के लिए, सरकार ने चालू वित्त वर्ष में ₹1,250 करोड़ का आवंटन किया है। इसका मुख्य उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों और कॉरपोरेट जगत की ज़रूरतों के बीच एक सीधा पुल बनाना है।
क्वालिटी पर ज़ोर और वित्तीय मदद
इस विस्तार में एक महत्वपूर्ण नया नियम जोड़ा गया है: अब इंडस्ट्री पार्टनर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि कम से कम 40% अप्रेंटिस 'अच्छा' या उससे ऊपर की रेटिंग प्राप्त करें। यह कदम सिर्फ संख्या बढ़ाने के बजाय, वास्तविक स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान केंद्रित करने का संकेत देता है। कंपनियों के लिए यह स्कीम वित्तीय रूप से आकर्षक बनी हुई है, क्योंकि सरकार एक साल तक के लिए ग्रेजुएट और डिप्लोमा अप्रेंटिस की स्टाइपेंड लागत का 50% रीइम्बर्स करना जारी रखेगी। वर्तमान में, ग्रेजुएट अप्रेंटिस को हर महीने ₹12,300 और डिप्लोमा धारकों को ₹10,900 मिलते हैं।
कंपनियों के लिए हायरिंग और लागत पर असर
निवेशकों के लिहाज़ से, यह प्रोग्राम आईटी, ऑटोमोटिव, बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर की कंपनियों के लिए काफी अहम है। इन सेक्टरों में अक्सर नए रिक्रूट्स को ट्रेनिंग देने की लागत ज़्यादा होती है। NATS में भाग लेकर, कंपनियां अपनी टैलेंट एक्विजिशन लागत को कम कर सकती हैं और इंडस्ट्री के लिए तैयार प्रोफेशनल्स का एक पूल बना सकती हैं। अगर यह सफल होता है, तो ऑनबोर्डिंग प्रोसेस में दक्षता बढ़ सकती है और नए कर्मचारियों के शुरुआती ट्रेनिंग में लगने वाला समय कम हो सकता है।
स्किल गैप को पाटने की कोशिश
सरकार की तरफ से बड़े पैमाने पर प्रयास किए जाने के बावजूद, सबसे बड़ी चुनौती अभी भी अकादमिक सिलेबस और वास्तविक जॉब मार्केट की ज़रूरतों के बीच का अंतर बनी हुई है। लेबर फोर्स सर्वे के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 तक 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए बेरोज़गारी दर 5.5% है। विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि प्रशिक्षण बढ़ाना ज़रूरी है, लेकिन इन कार्यक्रमों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्राइवेट सेक्टर इन अप्रेंटिस को स्थायी भूमिकाओं में कितनी अच्छी तरह समाहित कर पाता है। अगर ट्रेनिंग से लंबी अवधि की नौकरी नहीं मिलती है, तो युवा बेरोज़गारी पर इसका असर सीमित रह सकता है।
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
इस पहल की प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि कंपनियां इन अप्रेंटिस को कितनी तेज़ी और प्रभावी ढंग से अपने वर्कफ़ोर्स में एकीकृत करती हैं। निवेशक आने वाली तिमाहियों में मानव संसाधन लागत और भर्ती रणनीतियों के बारे में मैनेजमेंट की टिप्पणियों पर नज़र रख सकते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कंपनियां इन अप्रेंटिस को सफलतापूर्वक फुल-टाइम कर्मचारियों में बदल पा रही हैं, ताकि यह समझा जा सके कि यह प्रोग्राम वास्तविक बिजनेस वैल्यू प्रदान कर रहा है या सिर्फ अस्थायी मैनपावर सपोर्ट दे रहा है।
