भारत में लाइफ एक्सपेक्टेंसी साल 2023 में **71 साल** तक पहुंच गई है, जो कोरोना महामारी के बाद एक बड़ी रिकवरी है। हालांकि, 'हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी' अभी भी **60.6 साल** पर स्थिर है, जो इशारा करती है कि भविष्य में क्रॉनिक बीमारियों के इलाज और डायग्नोस्टिक सर्विसेज की डिमांड बढ़ने वाली है।
भारत ने आधिकारिक तौर पर महामारी से पहले के लाइफ एक्सपेक्टेंसी लेवल को पीछे छोड़ दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में यह आंकड़ा 68.1 साल के निचले स्तर पर था, जो अब सुधरकर 71 साल हो गया है। चिकित्सा सेवाओं में सुधार के चलते उम्र तो बढ़ रही है, लेकिन एक गहरी चिंता यह है कि लोग 'स्वस्थ' कितने साल रह रहे हैं।
क्रॉनिक बीमारियों का बढ़ता बोझ
'हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी' का आंकड़ा पिछले कुछ सालों में 60.6 साल पर लगभग स्थिर है, जबकि 2019 में यह 60.5 साल था। इसका मतलब है कि लोग लंबी उम्र तो पा रहे हैं, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। देश में अब दिल की बीमारियां, डायबिटीज और स्ट्रोक जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों का कहर बढ़ रहा है। गौर करने वाली बात है कि ये बीमारियां अब कुल मौतों का 75% हिस्सा हैं, जो साल 2000 में सिर्फ 34% थीं।
हेल्थकेयर सेक्टर के लिए निवेश का मौका
इस बदलाव ने पूरे हेल्थकेयर बिजनेस के मॉडल को बदल दिया है। अब फोकस इमरजेंसी केयर से हटकर लॉन्ग-टर्म मैनेजमेंट की तरफ शिफ्ट हो रहा है। ऐसे में डायग्नोस्टिक चेन, हार्ट केयर स्पेशलिस्ट और होम-बेस्ड हेल्थ मॉनिटरिंग कंपनियों के लिए आगे बड़ी संभावनाएं दिख रही हैं।
क्षेत्रीय तुलना में देखें तो बांग्लादेश जैसे देश, जिनकी जीडीपी प्रति व्यक्ति भारत के समान है, वहां भी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 72.7 साल है। यह बताता है कि केवल आर्थिक विकास ही काफी नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में सुधार और निजी क्षेत्र की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। निवेशकों के लिए आने वाले समय में हेल्थ इंश्योरेंस और स्पेशलाइज्ड क्रॉनिक केयर हॉस्पिटल सेक्टर में बड़े अवसर बन रहे हैं।
