भारत ने 4 अन्य देशों के साथ मिलकर WTO के सामने प्रोफेशनल क्वालिफिकेशंस की म्यूचुअल रिकग्निशन के लिए तकनीकी सहायता की मांग रखी है। इस कदम का मकसद विकासशील देशों के लिए रेगुलेटरी बाधाओं को कम करना और सर्विस एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है।
ट्रेड की राह में आ रही बाधाएं
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और किर्गिस्तान का एक गठबंधन अब वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) की कमिटी ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट के पास पहुंचा है। इनका कहना है कि IT, हेल्थकेयर और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टर के प्रोफेशनल्स को विदेश में काम करने के लिए बार-बार महंगी और लंबी सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। विकसित देश अक्सर कड़े लाइसेंसिंग नियम थोपते हैं, जो नॉन-टैरिफ बैरियर की तरह काम करते हैं और इमर्जिंग मार्केट के टैलेंट के लिए रास्ता बंद कर देते हैं।
क्या है भारत की योजना?
इस पहल के तहत WTO से मांग की गई है कि वह प्रोफेशनल क्वालिफिकेशन स्टैंडर्ड्स को अपने 'टेक्निकल असिस्टेंस एंड ट्रेनिंग प्लान' में शामिल करे। अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो WTO विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार अपनी लाइसेंसिंग प्रणाली को ढालने में मदद करेगा। इसका अंतिम लक्ष्य Mutual Recognition Arrangements (MRAs) को बढ़ावा देना है, ताकि एक देश की डिग्री और सर्टिफिकेट को दूसरा देश आधिकारिक तौर पर मान्यता दे सके।
इकोनॉमिक इम्पैक्ट और निवेश पर असर
हालांकि यह सीधे तौर पर किसी स्टॉक को प्रभावित नहीं करता, लेकिन लंबी अवधि में भारत के सर्विस सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस में बड़ा सुधार ला सकता है। भारतीय कंपनियों के लिए विदेश में टैलेंट भेजना सस्ता और आसान हो जाएगा। हालांकि, निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि WTO की बातचीत काफी धीमी होती है और इसमें कई देशों के अलग-अलग हित शामिल हैं। साथ ही, विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए भारत के बाजार खुलने से घरेलू कंपनियों के लिए कॉम्पिटिशन भी बढ़ सकता है। अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि WTO की कमिटी इन सुझावों को कैसे आगे बढ़ाती है।
