साल 2025 में लागू हुए नए Labour Codes के बावजूद प्रवासी मजदूरों की स्थिति में खास बदलाव नहीं आया है। राज्यों में नियमों को लागू करने में हो रही देरी के कारण कंपनियों के सामने कंप्लायंस और ऑपरेशनल रिस्क बढ़ गया है।
नवंबर 2025 में देश भर में चार एकीकृत Labour Codes लागू हुए थे, लेकिन एक साल बाद भी जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव असमान है। केंद्र सरकार ने मई 2026 में अंतिम नियम अधिसूचित किए और सितंबर 2026 से EPF वेज सीलिंग में भी बदलाव किया है, फिर भी प्रवासी मजदूरों को इनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
राज्यों के बीच नियमों का तालमेल नहीं
सबसे बड़ी समस्या नियमों की एकरूपता की कमी है। केंद्र ने तो अपने नियम बना लिए हैं, लेकिन कई राज्य अभी भी अपनी रेगुलेशंस को फाइनल करने में लगे हैं। राज्यों के लिए 31 अक्टूबर 2026 की डेडलाइन तय की गई है। इस बीच, अलग-अलग राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSH) कोड के तहत कॉन्ट्रैक्ट्स और पेरोल को स्टैंडर्डाइज करना मुश्किल हो रहा है।
कंपनियों पर बढ़ा वित्तीय बोझ
नए कोड्स ने बिजनेस करने की लागत (Cost of doing business) को बढ़ा दिया है। 50% वेज रूल के चलते ग्रेच्युटी और पीएफ में कंपनी का योगदान बढ़ गया है। इसके अलावा, 17 सितंबर 2026 से EPF वेज सीलिंग को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया गया है, जिससे कंपनियों के कैश फ्लो पर सीधा असर पड़ा है। नए नियमों के तहत अब स्वतंत्र प्रवासियों को भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है, जिससे कंपनियों को e-Shram जैसे पोर्टल्स पर डेटा मेंटेन करने का भारी प्रशासनिक बोझ उठाना पड़ रहा है।
रिस्क और निवेशकों के लिए संकेत
एक्वाकल्चर जैसे सेक्टर में श्रम शोषण की घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं, उनके लिए सख्त इंफोर्समेंट मशीनरी जरूरी है। निवेशकों के लिए यह एक रिप्यूटेशनल रिस्क है। यदि कोई कंपनी सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करती है, तो उस पर भारी पेनल्टी और लेबर अनरेस्ट का खतरा मंडराता रहेगा। आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर होगी कि क्या राज्य सरकारें इंडिपेंडेंट इंस्पेक्शन फ्रेमवर्क बना पाती हैं या नहीं, खासकर छोटी इकाइयों में जहां शोषण का जोखिम सबसे ज्यादा है।
