केंद्र सरकार ने National Social Assistance Programme के तहत बुजुर्गों को दी जाने वाली **₹200** प्रति माह की पेंशन को बरकरार रखा है। यह दर साल **2012** से ही स्थिर बनी हुई है, जबकि महंगाई ने बुजुर्गों की क्रय शक्ति (purchasing power) को काफी कम कर दिया है।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि 60 से 79 वर्ष की आयु के बुजुर्गों के लिए इंदिरा गांधी नेशनल ओल्ड एज पेंशन स्कीम के तहत मिलने वाली राशि ₹200 ही रहेगी। हालांकि, कई राज्य सरकारें इसमें अपना योगदान देकर इसे बढ़ा देती हैं, जिससे औसत पे-आउट करीब ₹1,100 तक पहुंच जाता है।
महंगाई और घटती क्रय शक्ति
Academy of Management Studies की रिसर्च बताती है कि साल 2012 के मुकाबले इस पेंशन की वास्तविक कीमत में 45% की गिरावट आई है। रूरल डेवलपमेंट मिनिस्ट्री भले ही लाभार्थियों के संतोषजनक फीडबैक का दावा कर रही हो, लेकिन दवाइयों और परिवहन जैसी जरूरी चीजों के बढ़ते खर्च ने इस स्थिर पेंशन के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
'सिल्वर इकॉनमी' और निवेश के अवसर
भारत की डेमोग्राफिक तस्वीर तेजी से बदल रही है। साल 2050 तक बुजुर्गों की संख्या 30 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। फिलहाल करीब 78% बुजुर्गों के पास कोई औपचारिक पेंशन का जरिया नहीं है और बहुत कम लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस है।
यह स्थिति 'सिल्वर इकॉनमी' (Silver Economy) को बढ़ावा दे रही है। प्राइवेट हेल्थकेयर, इंश्योरेंस और रिटायरमेंट प्लानिंग जैसे सेक्टरों के लिए यह एक बड़ा अवसर है। चूँकि सरकारी सहायता सीमित है, इसलिए परिवारों और प्राइवेट सेक्टर पर बुजुर्गों की देखरेख का बोझ बढ़ रहा है। आने वाले समय में इन्फ्लेशन-इंडेक्स आधारित पेंशन या प्राइवेट मेडिकल सुविधाओं की मांग में बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है।
