भारत ने यूरोपीय यूनियन (EU) के कार्बन बॉर्डर टैक्स को चुनौती देने के लिए WTO में थर्ड-पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया है। यह टैक्स भारतीय स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट कंपनियों के मुनाफे और कॉम्पिटिशन पर बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।
भारत का बड़ा कदम
भारत ने आधिकारिक तौर पर वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (WTO) में यूरोपीय यूनियन के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' के खिलाफ कानूनी लड़ाई में शामिल होने का फैसला किया है। भारत अब उस 18 देशों के समूह का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और चीन जैसे देश भी शामिल हैं। यह कदम उन भारतीय कंपनियों के लिए अहम है, जिनका बड़ा कारोबार यूरोप में है। इस दर्जे के साथ, नई दिल्ली अब WTO की पैनल सुनवाई में अपने तर्क और आधिकारिक सबमिशन पेश कर सकेगी।
क्यों है यह बड़ा रिस्क?
यूरोपीय यूनियन का यह मैकेनिज्म उन प्रोडक्ट्स पर कार्बन एमिशन का टैक्स लगाता है जो यूरोप में इंपोर्ट किए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, फर्टिलाइजर और हाइड्रोजन शामिल हैं। अगर कंपनियां इस टैक्स को अपने ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनके नेट प्रॉफिट पर सीधा असर पड़ेगा। इससे भारतीय प्रोडक्ट्स की कीमत यूरोप के स्थानीय सामानों के मुकाबले महंगी हो सकती है, जो ग्लोबल मार्केट में हमारी पकड़ कमजोर कर सकता है।
राहत की उम्मीद
कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी होती है, इसलिए सरकार 'नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर सर्टिफिकेशन बॉडीज' की मान्यता को लेकर बातचीत कर रही है। यदि EU भारत की वेरिफिकेशन एजेंसियों को मंजूरी देता है, तो भारतीय कंपनियों को अपना कार्बन डेटा सर्टिफाई कराने के लिए यूरोप पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इससे प्रशासनिक खर्च में काफी कमी आएगी और एक्सपोर्टर्स के लिए काम करना आसान हो जाएगा।
निवेशकों के लिए संकेत
शेयरधारकों को यह ध्यान देना चाहिए कि क्या सरकार कूटनीतिक स्तर पर टैक्स छूट या आपसी मान्यता (Mutual Recognition) हासिल कर पाती है। लंबी अवधि में, वही कंपनियां सफल होंगी जो अपनी प्रोडक्शन प्रोसेस को कम कार्बन वाली तकनीकों की ओर तेजी से शिफ्ट कर पाएंगी और अपनी एफिशिएंसी को बेहतर करेंगी।
