भारत अब Southern Indian Ocean Fisheries Agreement (SIOFA) का पूर्ण सदस्य बन गया है। इससे भारतीय मछुआरों और कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्र में हाई-वैल्यू संसाधनों तक पहुंच का रास्ता खुल गया है, हालांकि इसके लिए अब एडवांस्ड डीप-सी ट्रॉलर और बड़े निवेश की जरूरत होगी।
भारत का SIOFA का पूर्ण सदस्य बनना देश की समुद्री आर्थिक नीति में एक बड़ा बदलाव है। पहले केवल 'कोऑपरेटिंग पार्टनर' रहने के बाद, अब भारत के पास अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में निर्णय लेने और डीप-सी संसाधनों के दोहन का आधिकारिक अधिकार आ गया है। अब भारतीय जहाज स्क्विड, टूथफिश और अल्फोंसिन जैसी महंगी मछलियों का शिकार कर सकेंगे, जो पहले भारतीय पहुंच से दूर थीं।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और मौके
यह कदम लंबी अवधि के लिए एक बड़ा अवसर तो है, लेकिन इसके लिए भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) की जरूरत है। तटों के पास मछली पकड़ने वाली मौजूदा नावें गहरे समुद्र के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कंपनियों को आधुनिक डीप-सी ट्रॉलर और कोल्ड-चेन फैसिलिटी में निवेश करना होगा।
कड़ा मुकाबला और अनुपालन
भारतीय कंपनियों को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अनुभवी प्लेयर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी। साथ ही, SIOFA के सख्त नियम और 'High Seas Boarding and Inspection' जैसे तंत्र के कारण सस्टेनेबल फिशिंग का पालन करना अनिवार्य है। नियमों की अनदेखी से बड़ी रेगुलेटरी दिक्कतें आ सकती हैं।
सरकार की भूमिका पर नजर
आने वाले समय में सरकारी सब्सिडी और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में होने वाले सुधारों पर नजर रखना जरूरी है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां शुरुआती लागत और जटिल लॉजिस्टिक्स को कैसे मैनेज करती हैं।
