भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब **$50 बिलियन** के आंकड़े को छूने की तैयारी में है। ASSOCHAM की रिपोर्ट के मुताबिक, **10 ट्रिलियन येन** (लगभग **$62 बिलियन**) के निजी निवेश के दम पर यह लक्ष्य हासिल किया जाएगा। हालांकि, ट्रेड डेफिसिट और रेगुलेटरी बाधाएं अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार तेजी से आगे बढ़ रहा है। उद्योग संस्था ASSOCHAM की 26 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 तक दोनों देशों का व्यापार $50 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में कुल मर्चेंडाइज ट्रेड का आंकड़ा $27.47 बिलियन था। इस ग्रोथ के लिए अगले एक दशक में 10 ट्रिलियन येन यानी लगभग $62 बिलियन के बड़े निवेश की योजना है।
ट्रेड डेफिसिट पर मंथन
टारगेट काफी महत्वाकांक्षी है, लेकिन ट्रेड बैलेंस में एक बड़ी खाई है। FY26 में जापान का भारत को एक्सपोर्ट $21.43 बिलियन था, जबकि भारत का जापान को एक्सपोर्ट केवल $6.04 बिलियन रहा। इस अंतर को पाटने के लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापान दौरे के दौरान 2011 के ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा पर जोर दिया है, ताकि भारतीय उत्पादों के लिए जापानी बाजार को आसान बनाया जा सके।
हाई-टेक सेक्टर पर फोकस
यह निवेश केवल पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर जोर है। भारत अब हाई-एंड इंजीनियरिंग और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स के जरिए जापान की औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने की दिशा में बढ़ रहा है।
चुनौतियां और जोखिम
जापानी बाजार में प्रवेश करना भारतीय कंपनियों के लिए आसान नहीं है। वहां के कड़े क्वालिटी स्टैंडर्ड और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की संस्कृति एक बड़ी रुकावट है। इसके अलावा, ग्लोबल एनर्जी प्राइस में उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट में जियोपॉलिटिकल तनाव जैसे जोखिम बने हुए हैं। आने वाले 12 महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी वादे जमीनी स्तर पर कितने प्रोजेक्ट्स में तब्दील हो पाते हैं।
