भारत और जापान के बीच व्यापार घाटा फाइनेंशियल ईयर **2025-26** में बढ़कर **$15.4 बिलियन** हो गया है, जबकि कुल द्विपक्षीय व्यापार **$27.47 बिलियन** रहा। जापानी बाजार में सख्त नियमों और गैर-टैरिफ बाधाओं के कारण भारतीय कंपनियों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।
व्यापार असंतुलन की हकीकत
फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, कुल द्विपक्षीय व्यापार में 9.18% की वृद्धि के साथ यह $27.47 बिलियन तक पहुंच गया है, लेकिन ट्रेड डेफिसिट का बढ़ना चिंता का विषय है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों टोक्यो में है ताकि नियामक बाधाओं को कम करने पर चर्चा की जा सके।
क्यों आ रही हैं दिक्कतें?
FICCI के प्रेसिडेंट अनंत गोयनका ने साफ किया है कि असली चुनौती टैक्स नहीं, बल्कि 'नॉन-टैरिफ बैरियर्स' (Non-tariff barriers) हैं। जापान में जटिल रेगुलेटरी और सर्टिफिकेशन नियमों के कारण भारतीय सामानों का वहां पहुंचना मुश्किल हो गया है। खासकर फार्मा सेक्टर में रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया इतनी कठिन है कि भारतीय दवा कंपनियां वहां के बड़े बाजार में अपनी जगह नहीं बना पा रही हैं।
नया रास्ता: 'India-Japan for Africa' पहल
जापान में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की संस्कृति के कारण भारतीय कंपनियां अब नई रणनीति पर काम कर रही हैं। FICCI ने 'इंडिया-जापान फॉर अफ्रीका' पहल का प्रस्ताव रखा है। इसके जरिए दोनों देश मिलकर अफ्रीका में निवेश करेंगे, जिससे भारतीय कंपनियां जापानी तकनीक और वित्तीय सपोर्ट का लाभ उठाकर उभरते हुए बाजारों में अपनी धाक जमा सकेंगी।
आगे क्या?
बाजार के जानकारों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या फार्मा रजिस्ट्रेशन के नियमों में ढील दी जाएगी और स्टील सेक्टर में भारतीय माल की खरीद बढ़ेगी या नहीं। इन प्रशासनिक बाधाओं को दूर करना ही आने वाले समय में द्विपक्षीय व्यापार की दिशा तय करेगा।
