सितंबर तिमाही में India Inc ने शानदार प्रदर्शन करते हुए नेट प्रॉफिट में **27%** की बढ़ोतरी दर्ज की है। इस तेजी में सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की बड़ी भूमिका रही, लेकिन अब बढ़ती कमोडिटी और फ्रेट लागत मुनाफा कम कर रही है, जिसके चलते कई कंपनियों ने कीमतें **30%** तक बढ़ा दी हैं।
भारतीय कंपनियों ने सितंबर तिमाही में पिछले 10 तिमाहियों में सबसे मजबूत प्रदर्शन करते हुए नेट प्रॉफिट में 27% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की है। हालांकि, ऊपरी तौर पर यह रिकवरी अच्छी दिख रही है, लेकिन गहराई में देखें तो बढ़ती इनपुट कॉस्ट कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव डाल रही है।
ऑइल कंपनियों का बड़ा योगदान
इस मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सरकारी तेल कंपनियों (Oil Marketing Companies) से आया है। इन कंपनियों ने जून तिमाही के ₹13,600 करोड़ के नुकसान के मुकाबले सितंबर में ₹12,700 करोड़ का प्रॉफिट कमाया है। यदि हम इन ऑइल कंपनियों और बैंकों को अलग कर दें, तो नेट प्रॉफिट मार्जिन 14.4% रहता है। यह भले ही 4 साल के औसत 13.4% से अधिक हो, लेकिन पिछली तिमाही के 15.3% के मार्जिन से कम है।
क्यों बढ़ रही है चिंता?
कच्चा माल, मेटल और फ्रेट (माल ढुलाई) की बढ़ती लागत कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। अपने बॉटम लाइन को बचाने के लिए कंपनियों ने पिछले 6 महीनों में प्रोडक्ट की कीमतें 10% से 30% तक बढ़ा दी हैं। खतरा यह है कि अगर कमोडिटी के दाम और बढ़े, तो कंपनियां कितनी बार कीमतें बढ़ा पाएंगी? अगर कीमतें और बढ़ीं, तो कंज्यूमर डिमांड पर बुरा असर पड़ सकता है।
सेक्टर का हाल
बाजार में एक स्पष्ट विभाजन दिख रहा है:
- दबाव वाले सेक्टर: एयरलाइंस, टायर और सीमेंट कंपनियां लागत बढ़ने से जूझ रही हैं।
- रेसिलिएंट सेक्टर: ऑटो कंपोनेंट कंपनियां अब डिफेंस और रेलवे जैसे क्षेत्रों में शिफ्ट हो रही हैं, जबकि इलेक्ट्रिकल कैपिटल गुड्स कंपनियों को डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर से फायदा हो रहा है।
ब्रेंट क्रूड के दाम $115 प्रति बैरल के आसपास बने हुए हैं, जो मार्जिन पर दबाव बनाए रखेंगे। निवेशकों को अब दिसंबर तिमाही के नतीजों पर नजर रखनी होगी कि क्या कंपनियां अपनी ग्रोथ बरकरार रख पाती हैं या बढ़ती लागत का असर नतीजों पर साफ दिखने लगेगा।
