वित्तीय वर्ष 2027 की पहली छमाही में भारतीय कॉर्पोरेट जगत की सेहत मजबूत बनी हुई है। क्रेडिट रेटिंग में अपग्रेड की संख्या डाउनग्रेड से कहीं ज्यादा रही है। इंफ्रा और पावर सेक्टर रफ्तार पकड़े हुए हैं, हालांकि क्रूड ऑयल और अमेरिकी टैरिफ से जुड़े जोखिमों पर निवेशकों को नजर रखनी होगी।
ICRA और CareEdge जैसी प्रमुख रेटिंग एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने इस फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में गजब की मजबूती दिखाई है। क्रेडिट अपग्रेड और डाउनग्रेड का अनुपात 3.2x से 3.95x के बीच रहा है, जो यह दर्शाता है कि कंपनियों की बैलेंस शीट पहले से काफी साफ और कमाई स्थिर हुई है।
मजबूत बैलेंस शीट और डेट मैनेजमेंट
भारतीय कंपनियों ने पिछले एक दशक में अपना कर्ज काफी कम किया है। वर्तमान में कॉर्पोरेट इंडिया का मीडियन डेट-टू-इक्विटी रेशियो लगभग 0.50x है, जो एक सुरक्षित स्तर माना जाता है। वहीं, कंपनियों की ब्याज चुकाने की क्षमता यानी 'इंटरेस्ट कवरेज रेशियो' भी औसतन 7.59x पर है। यह रेशियो बताता है कि कंपनियों के पास मुनाफे का एक बड़ा बफर है, जिससे वे ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के बावजूद लिक्विडिटी संकट से बची रहेंगी।
सेक्टर के हाल: कौन आगे, कौन पीछे?
ग्रोथ का पहिया हर सेक्टर में एक समान नहीं घूम रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर, रियल एस्टेट और कैपिटल गुड्स सेक्टर का प्रदर्शन सबसे बेहतरीन है, जिसके पीछे सरकार का इंफ्रा पर खर्च और निजी क्षेत्र की सक्रियता बड़ी वजह है। इसके उलट, डायमंड पॉलिशिंग, टेक्सटाइल और स्पेशलिटी केमिकल्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर दबाव में हैं। कमजोर वैश्विक मांग और कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण इन क्षेत्रों की कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ा है।
आगे की राह और चुनौतियां
वित्त वर्ष 2027 की दूसरी छमाही के लिए एनालिस्ट्स सतर्क हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल ला सकता है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ेगी। इसके अलावा, अमेरिकी ट्रेड टैरिफ भारतीय निर्यातकों के लिए नई मुश्किल पैदा कर सकते हैं। घरेलू स्तर पर, मानसून की अनिश्चितता और महंगाई का असर ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे इनपुट-हेवी सेक्टर में मार्जिन और ब्याज दरों से जुड़ी हलचल पर बारीक नजर रखें।
