वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का चीन से आयात बिल **131 अरब डॉलर** से अधिक हो गया है। इंजीनियरिंग और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों से आयात में भारी बढ़ोतरी इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह है।
इंजीनियरिंग और टेक्सटाइल से आया बड़ा उछाल
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में चीन से भारत का कुल आयात 131.63 अरब डॉलर रहा। यह आंकड़ा देश के कुल आयात का लगभग 17% है, जिसके चलते 112.16 अरब डॉलर का बड़ा ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) सामने आया है। निवेशकों के लिए, इन आयातों का विश्लेषण देश की औद्योगिक निर्भरताओं और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के सामने मौजूद चुनौतियों की तस्वीर पेश करता है।
इस दौरान, इंजीनियरिंग गुड्स का आयात 75.82 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 19% ज्यादा है। इसमें कैपिटल इक्विपमेंट और इंटरमीडिएट कंपोनेंट्स शामिल हैं। वहीं, टेक्सटाइल सेक्टर में आयात 22.5% बढ़कर 4.46 अरब डॉलर हो गया। खिलौनों के सेगमेंट में भी 20.7% की बढ़ोतरी देखी गई, जो 350 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
घरेलू मैन्युफैक्चरर्स पर दबाव
यह ट्रेंड घरेलू निर्माताओं, खासकर माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) के लिए चिंता का विषय बन गया है। तमिलनाडु जैसे राज्यों के टेक्सटाइल क्लस्टर्स को इन सस्ते चीनी इम्पोर्ट्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि घरेलू कंपनियों को अपनी कीमतों और प्रोडक्शन स्केल को बनाए रखने में दिक्कत आ सकती है।
स्ट्रैटेजिक निर्भरता और घरेलू सुरक्षा
चीन से होने वाले सभी आयात सिर्फ प्रतिस्पर्धा का खतरा नहीं हैं। इसमें भारत के क्लीन एनर्जी और हाई-एंड टेक्नोलॉजी से जुड़े महत्वपूर्ण इनपुट्स भी शामिल हैं। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैट्री, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए जरूरी लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट जैसे कच्चे माल का बड़ा हिस्सा इन्हीं माध्यमों से आता है। इस वजह से, भारत के उभरते हुए सेक्टर्स इन इम्पोर्ट्स पर निर्भर हैं।
इस संतुलन को साधने के लिए, सरकार ने दो-तरफा रणनीति अपनाई है। जहां एक ओर जरूरी टेक इनपुट्स की सप्लाई चेन बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर सरकार गैर-जरूरी और सस्ते सामानों के फ्लो को कंट्रोल करने के लिए रेगुलेटरी टूल्स का इस्तेमाल कर रही है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज (DGTR) एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने की जांच में सक्रिय है। इसके अलावा, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स (QCOs) और टेस्टिंग प्रोटोकॉल्स जैसे गैर-टैरिफ बैरियर भी घटिया उत्पादों को रोकने में मदद कर रहे हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
लगातार बढ़ता ट्रेड डेफिसिट और आयात की मात्रा मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए एक बड़ा फोकस रहेगी। निवेशकों को एंटी-डंपिंग ड्यूटी की जांचों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग सेक्टर में घरेलू कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ेगा। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी जैसे सेक्टर्स में 'मेक इन इंडिया' पहलों की प्रगति पर नजर रखना भी जरूरी है, ताकि यह देखा जा सके कि क्या घरेलू उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे इम्पोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भरता को कम कर सकती है और लंबे समय में ट्रेड बैलेंस को सुधार सकती है।
