भारत में कंजम्पशन (Consumption) की रफ्तार के पीछे रिटेल लोन का बड़ा हाथ है। घरेलू कर्ज अब GDP का करीब **48%** हो गया है, जो आर्थिक मोर्चे पर चिंता बढ़ा रहा है। पर्सनल और गोल्ड लोन पर बढ़ती निर्भरता ने भविष्य की डिमांड और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारत में हाउसहोल्ड कंजम्पशन इकोनॉमी को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत यह है कि यह इंजन अब कर्ज (Debt) के ईंधन पर चल रहा है। दिसंबर 2025 तक भारत में घरेलू कर्ज बढ़कर GDP का लगभग 47.8% हो गया है। हालांकि जीडीपी के आंकड़े विकास की कहानी बयां कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह कर्ज का बढ़ता बोझ वित्तीय कमजोरी का संकेत दे रहा है।
रिटेल क्रेडिट की बदलती तस्वीर
मार्केट एनालिस्ट इस बात से चिंतित हैं कि कर्ज का स्वरूप बदल गया है। पहले हाउसहोल्ड लोन में होम लोन का हिस्सा ज्यादा होता था, जिसे एक एसेट-बेस्ड स्टेबल लोन माना जाता है। अब स्थिति उलट है—पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और कंज्यूमर ड्यूरेबल फाइनेंस जैसे 'नॉन-हाउसिंग' लोन कुल घरेलू देनदारियों का 58.4% हो चुके हैं। इसका सीधा मतलब है कि एक बड़ा कर्ज लॉन्ग-टर्म एसेट बनाने के बजाय तुरंत खर्च (Consumption) करने में इस्तेमाल हो रहा है।
विशेष रूप से, गोल्ड-बैक लोन में साल-दर-साल 42% से ज्यादा का उछाल आया है। यह दर्शाता है कि लोग अपनी आमदनी और बढ़ते खर्चों के बीच की खाई को पाटने के लिए कर्ज ले रहे हैं। जब लोग रोजमर्रा के खर्च के लिए हाई-इंटरेस्ट क्रेडिट पर निर्भर होते हैं, तो महंगाई या जॉब इनस्टेबिलिटी जैसे झटकों से बचने के लिए उनके पास कोई कुशन (Buffer) नहीं बचता।
सांख्यिकीय चुनौतियां और RBI की उलझन
भारत के डेटा में एक पेच भी है। सांख्यिकी मंत्रालय (MOSPI) घरेलू सेक्टर के डेटा में छोटी दुकानों और खुद के बिजनेस (Unincorporated Enterprises) को भी जोड़ता है। इससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कर्ज बिजनेस के लिए लिया गया है या पर्सनल खर्च के लिए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए यह दुविधा है, जिसने अगस्त 2026 की बैठक में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है। अगर कंजम्पशन आय के बजाय क्रेडिट से बढ़ रहा है, तो ब्याज दरों में बदलाव का असर डिमांड पर कम पड़ता है, क्योंकि लोग पहले से ही EMI के बोझ तले दबे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को इस कर्ज और खपत के समीकरण पर नजर रखनी चाहिए। अगर लोन के सहारे चल रही यह खपत टूटती है, तो ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और लग्जरी गुड्स की मांग में भारी गिरावट आ सकती है। फिलहाल मार्केट एक्सपर्ट्स प्रमुख लेंडर्स की क्रेडिट क्वालिटी और डेलीक्वेंसी रेट्स (Delinquency rates) को बारीकी से ट्रैक कर रहे हैं। आने वाले समय में केंद्रीय बैंक की टिप्पणियां यह साफ कर देंगी कि क्या यह कर्ज का स्तर सस्टेनेबल है या इकोनॉमी को 'डी-लेवरेजिंग' (कर्ज घटाने) के दौर से गुजरना होगा।
