भारत ने GDP की गणना के लिए बेस ईयर को बदलकर **2022-23** कर दिया है। इस बदलाव से कृषि क्षेत्र का योगदान उम्मीद से अधिक और **2023-24** की ग्रोथ पहले के अनुमानों से कम नजर आ रही है।
भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर GDP की गणना का बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य आज की खपत के पैटर्न को सही ढंग से समझना और इनफॉर्मल सेक्टर को बेहतर तरीके से कवर करना है। हालांकि, इन संशोधित आंकड़ों ने देश की आर्थिक विकास की कहानी को थोड़ा धीमा कर दिया है।
कृषि क्षेत्र का बढ़ा दबदबा
नई रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले नतीजों में कृषि क्षेत्र का बढ़ता वेटेज है। अब GDP में कृषि का योगदान लगभग 20% हो गया है, जो पुराने बेस ईयर में 15% आंका गया था। इसका मतलब यह है कि लेबर और प्रोडक्शन का खेती से मैन्युफैक्चरिंग की तरफ शिफ्ट होने की रफ्तार उम्मीद से कम है। इसके कारण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब पहले की तुलना में छोटा दिख रहा है। निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी खेती पर जितनी सोची गई थी, उससे ज्यादा निर्भर है।
सुस्त ग्रोथ और इकोनॉमिक स्लैक
2023-24 के लिए रिवाइज्ड आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार उतनी तेज नहीं थी, जितना शुरुआती अनुमान थे। पहले जहां ग्रोथ 9% से अधिक रहने की उम्मीद थी, वहीं नए डेटा में इसमें लगभग 2% की कटौती हुई है। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में 'स्लैक' (खाली क्षमता) ज्यादा थी। इससे हालांकि भविष्य में बिना महंगाई के बढ़ने की गुंजाइश तो है, लेकिन यह डिमांड की मजबूती पर सवाल खड़े करता है।
निवेशकों के लिए अनिश्चितता
इतिहास के आंकड़ों में इतनी बड़ी कटौती ने इकोनॉमिक ट्रैकिंग की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ दी है। निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण 'बैक सीरीज' डेटा पर नजर रखना होगा, जिससे यह स्पष्ट हो पाएगा कि यह केवल सांख्यिकीय सुधार (statistical correction) है या स्ट्रक्चरल बदलाव। अब बाजार की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह सरकार की मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों (Monetary and Fiscal Policies) में कोई बड़ा बदलाव लाएगी।
