India और GCC के बीच फ्री ट्रेड डील पर फिर शुरू हुई बातचीत, ₹14 लाख करोड़ से ज़्यादा का व्यापार

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
India और GCC के बीच फ्री ट्रेड डील पर फिर शुरू हुई बातचीत, ₹14 लाख करोड़ से ज़्यादा का व्यापार

भारत और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) ने रियाद में हुई हाई-लेवल बातचीत के बाद एक व्यापक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के लिए फिर से बातचीत शुरू कर दी है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में दोनों के बीच **₹178.56 बिलियन (लगभग ₹14.8 लाख करोड़)** का व्यापार हुआ, जिससे यह डील आर्थिक एकीकरण और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम है। निवेशक अब सितंबर 2026 में होने वाली अगली मिनिस्टरियल मीटिंग पर नज़र रख रहे हैं।

रियाद में शुरू हुई अहम बैठक

भारत और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) ने एक व्यापक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के लिए आधिकारिक तौर पर बातचीत फिर से शुरू कर दी है। रियाद में भारतीय राजदूत विपुल और GCC के सेक्रेटरी जनरल जसेम मोहम्मद अल बुदैवी के बीच हाई-लेवल बातचीत हुई। इस मीटिंग का मुख्य एजेंडा भारत और छह देशों वाले इस ब्लॉक - बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात - के बीच आर्थिक सहयोग को गहरा करने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करना था।

रिकॉर्ड तोड़ व्यापारिक संबंध

यह नई कोशिश दोनों पक्षों के बीच पहले से मौजूद विशाल व्यापारिक संबंधों पर आधारित है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में, भारत और GCC के बीच कुल व्यापार $178.56 बिलियन (लगभग ₹14.8 लाख करोड़) था, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का लगभग 15.42% है। वर्तमान में, यह व्यापार मुख्य रूप से ऊर्जा पर केंद्रित है, जिसमें भारत इस क्षेत्र से भारी मात्रा में कच्चा तेल, एलएनजी (LNG) और पेट्रोकेमिकल्स का आयात करता है, जबकि इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा, मशीनरी और चावल जैसे कृषि उत्पाद निर्यात करता है।

निवेश और भविष्य की राह

इस समझौते का रणनीतिक महत्व स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना और निवेश के रास्ते खोलना है। सितंबर 2025 तक, GCC देशों से भारत में कुल निवेश $31.14 बिलियन से अधिक हो चुका था। एक FTA से व्यापार बाधाएं कम हो सकती हैं, जिससे इन बाजारों में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है। भारत पहले ही UAE और ओमान के साथ अलग-अलग व्यापार समझौते कर चुका है, और पूरे GCC के साथ एक व्यापक डील इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कड़ी को पूरा करेगी।

क्या हैं चुनौतियां?

हालांकि, एक अंतिम समझौते की राह में कई जटिलताएं हैं। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक भारत का इस क्षेत्र के साथ लगातार बना हुआ व्यापार घाटा है, जो ऊर्जा आयात पर उसकी उच्च निर्भरता के कारण है। बातचीतकारों को भारतीय सामानों के लिए अनुकूल बाजार पहुंच सुरक्षित करते हुए इस घाटे को संतुलित करने के तरीके खोजने होंगे। इसके अलावा, छह अलग-अलग सदस्य देशों में टैरिफ संरचनाओं और मूल नियमों (rules of origin) को सुसंगत बनाना, जिनमें से प्रत्येक का अपना नियामक वातावरण है, एक समय लेने वाली प्रक्रिया साबित होती है। ये कारक बताते हैं कि समझौते को अंतिम रूप देने में व्यापक और तकनीकी बातचीत की आवश्यकता होगी।

आगे क्या?

इस पहल का अगला बड़ा कदम सितंबर 2026 में निर्धारित एक मिनिस्टरियल मीटिंग है। इस मीटिंग से एजेंडा तय होने और लंबित मुद्दों को सुलझाने की उम्मीद है, जिससे समझौते के संभावित समापन के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा मिलेगी। ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, कपड़ा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में निवेशकों और व्यवसायों के लिए इन वार्ताओं का परिणाम महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इससे लागत कम हो सकती है, बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है और क्षेत्रों के बीच पूंजी प्रवाह मजबूत हो सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.