भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में लगातार तीसरे हफ्ते गिरावट दर्ज की गई है। 25 सितंबर, 2026 को समाप्त सप्ताह में इसमें **$18.34 अरब** की कमी आई है। RBI रुपये की गिरती चाल को संभालने के लिए बाजार में आक्रामक तरीके से डॉलर बेच रहा है, जिसका सीधा असर अब लिक्विडिटी पर पड़ता दिख रहा है।
खजाना घटने की असली वजह
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार ग्लोबल अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में आए ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार घटकर $747.557 अरब के स्तर पर आ गया है। इस गिरावट में मुख्य योगदान फॉरेन करेंसी एसेट्स का रहा, जिसमें $15.57 अरब की कटौती हुई, जबकि गोल्ड रिजर्व में $2.59 अरब की कमी दर्ज की गई।
रुपया इस साल अब तक 6% से ज्यादा टूट चुका है, जिससे यह एशियाई मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है। RBI की इस रणनीति का लक्ष्य डॉलर की सप्लाई बढ़ाकर रुपये के दाम में आ रही भारी गिरावट को थामना है।
मार्केट लिक्विडिटी पर दबाव
RBI की इस दखलंदाजी का एक बड़ा असर देश के बैंकिंग सिस्टम में मौजूद लिक्विडिटी पर पड़ रहा है। जब केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर बाजार से रुपया वापस खींचता है, तो सिस्टम में नकदी कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) में इजाफा हो सकता है, जिससे कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा।
निवेशकों की नजर कहां है?
अब बाजार की निगाहें 5-7 अक्टूबर, 2026 को होने वाली RBI की अगली मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग पर टिक गई हैं। निवेशक यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या केंद्रीय बैंक रुपये को सहारा देने के लिए रेपो रेट (Repo Rate) में कोई बदलाव करेगा या लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए कोई नया रुख अपनाएगा।
