भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) रिकॉर्ड **$785.71 बिलियन** के स्तर पर पहुंच गया है। इसके बावजूद रुपया डॉलर के मुकाबले **96** के करीब कमजोरी दिखा रहा है। क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें और FII की भारी बिकवाली करेंसी पर बड़ा दबाव बना रही है।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर, 2026 तक $785.71 बिलियन के सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time high) पर पहुंच गया है। यह बफर इकोनॉमी को बड़े झटकों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है, लेकिन यह डॉलर के मुकाबले रुपये को 95.7-96 के दो महीने के निचले स्तर से ऊपर लाने में नाकाम रहा है।\n\n### रिजर्व बढ़ने के बाद भी रुपया क्यों नहीं संभला?\nइसका बड़ा कारण यह है कि सेंट्रल बैंक इन रिजर्व का इस्तेमाल केवल अत्यधिक अस्थिरता (Volatility) को कंट्रोल करने के लिए करता है, न कि रुपये की कीमत को एक दायरे में बांधने के लिए। रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम से आया है। ये डॉलर सेंट्रल बैंक की बैलेंस शीट में हैं और खुले बाजार में जारी नहीं किए जाते, इसलिए ये रुपये की तत्काल सप्लाई-डिमांड को प्रभावित नहीं करते।\n\n### ग्लोबल दबाव और चुनौतियां\nरुपये की गिरावट के पीछे बाहरी कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है। वेस्ट एशिया में तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड $109 प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है, जिससे अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं।\n\nइसके अलावा, अमेरिका में ब्याज दरें 19 साल के उच्च स्तर 5.02% पर पहुंच गई हैं। इसका नतीजा यह है कि ग्लोबल निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर रुख कर रहे हैं। इस साल अब तक विदेशी निवेशकों (FII) ने बाजार से करीब $27 बिलियन की निकासी की है, जो रुपये पर सीधा दबाव डाल रही है।\n\n### निवेशकों के लिए संकेत\nरुपये की कमजोरी से उन कंपनियों का मार्जिन प्रभावित होता है जो कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं, विशेष रूप से एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में। हालांकि, सेंट्रल बैंक के पास 11 महीने के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन फिलहाल रुपये की चाल ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और ऑयल की कीमतों से ही तय होगी। भविष्य में करेंसी की स्टेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत स्थानीय मुद्रा में व्यापार (Local currency settlement) को कितना बढ़ा पाता है।
