सितंबर 2026 में भारत की रिटेल फूड इन्फ्लेशन उछलकर **7.74%** पर पहुंच गई है। इसकी बड़ी वजह मानसून में **13%** की कमी है, जो एक दशक में सबसे खराब स्थिति है। इस दबाव के चलते Reserve Bank of India ने रेपो रेट को **5.50%** कर दिया है और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का रुख अपनाया है।
भारत की अर्थव्यवस्था एक कठिन दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में मानसून की सबसे खराब स्थिति यानी 13% की बारिश की कमी ने कृषि उत्पादन पर संकट खड़ा कर दिया है। मिट्टी में नमी की कमी के कारण रबी फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है, जिससे भविष्य में अनाज की कीमतों के और बढ़ने का डर बना हुआ है।
RBI का एक्शन और ब्याज दरें
लगातार बढ़ती खाद्य कीमतों को थामने के लिए Reserve Bank of India ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की है, जिससे यह 5.50% पर पहुंच गया है। RBI ने अब 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (Calibrated Tightening) का रुख अपनाया है, जिसका मतलब है कि आने वाले समय में महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों में और 50 से 75 बेसिस पॉइंट्स तक की बढ़ोतरी की जा सकती है। निवेशकों के लिए इसका सीधा संकेत है कि कॉरपोरेट्स के लिए लोन लेना महंगा होगा और क्रेडिट डिमांड धीमी पड़ सकती है।
FMCG और ग्रामीण मांग पर असर
महंगाई का सबसे ज्यादा असर पोल्ट्री, डेयरी और अंडों जैसी प्रोटीन आधारित चीजों पर दिख रहा है। एनिमल फीड यानी चारे की लागत बढ़ने से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर तगड़ा दबाव है। FMCG सेक्टर की कंपनियों के लिए चुनौती यह है कि वे बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर डालें या खुद सहें, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में पहले ही महंगाई के कारण खपत (Consumption) में कमी देखी जा रही है। अगर ग्रामीण परिवारों का बजट खाने-पीने की चीजों में ही खर्च हो जाएगा, तो वे बाकी गैर-जरूरी चीजों की खरीदारी कम कर देंगे।
रबी फसलों पर मंडराता खतरा
महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में मिट्टी में नमी की भारी कमी है, जो 2026-27 फाइनेंशियल ईयर के एग्रीकल्चरल GDP को प्रभावित कर सकती है। सरकार महंगाई को कम करने के लिए इंपोर्ट का सहारा तो ले रही है, लेकिन ग्लोबल कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये की कमजोरी के कारण यह रणनीति भी कम प्रभावी साबित हो रही है। अब बाजार की नजरें RBI की अगली बैठक के मिनट्स और रबी बुवाई के आधिकारिक आंकड़ों पर टिकी हैं।
