भारत का फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) अप्रैल से जुलाई **2026** के बीच **₹4.55 लाख करोड़** पर पहुंच गया है, जो पूरे साल के टारगेट का **26.8%** है। टैक्स कलेक्शन मजबूत है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च से सरकार का जोर बना हुआ है।
अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच का डेटा सामने आया है, जिसमें फिस्कल डेफिसिट ₹4.55 लाख करोड़ दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा पूरे साल के लिए निर्धारित ₹16.96 लाख करोड़ के लक्ष्य का 26.8% है। फिस्कल डेफिसिट तब बढ़ता है जब सरकार की कमाई (टैक्स और अन्य स्रोत) से ज्यादा उसका खर्च होता है, जिसे पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है।
रेवेन्यू और खर्च का गणित
सरकार का रेवेन्यू कलेक्शन फिलहाल मजबूत बना हुआ है। अप्रैल-जुलाई की अवधि में नेट टैक्स रिसीट्स ₹8.5 लाख करोड़ रही, जबकि नॉन-टैक्स रेवेन्यू ₹4.2 लाख करोड़ पर रहा। यह सरकार की आमदनी को बनाए रखने की कोशिशों को दर्शाता है, ताकि कर्ज पर निर्भरता कम रहे।
कुल खर्च की बात करें, तो इस दौरान सरकार ने ₹17.6 लाख करोड़ खर्च किए। इसमें से ₹4.5 लाख करोड़ सीधे कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में गए हैं। इस पैसे को सड़क, रेलवे और अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स में लगाया गया है ताकि लंबी अवधि में देश की प्रोडक्शन क्षमता और ग्रोथ को रफ्तार मिल सके।
चुनौतियां और भविष्य की नजर
हालाँकि ये आंकड़े अभी बजट के दायरे में हैं, लेकिन इकोनॉमिस्ट्स के सामने कुछ सवाल जरूर हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या टैक्स कलेक्शन की मौजूदा रफ्तार साल के बाकी महीनों में भी कायम रहेगी? अगर रेवेन्यू सुस्त पड़ता है और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च जारी रहता है, तो फिस्कल डेफिसिट पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा, इन्फ्लेशन पर इस खर्च के असर को भी मॉनिटर किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य इस फाइनेंशियल ईयर में डेफिसिट को 4.3% तक सीमित रखने का है, जबकि पिछले साल यह 4.4% रहा था। निवेशकों की नजर अब सरकार के अगले महीनों के रेवेन्यू और खर्च के आंकड़ों पर होगी कि क्या मजबूत टैक्स रिसिप्ट्स, सरकारी खर्च के भारी दबाव को मैनेज कर पाएंगे या नहीं।
