अगस्त 2026 तक भारत का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़कर **₹7.10 लाख करोड़** तक पहुंच गया है, जो सालाना बजट लक्ष्य का **42%** है। पिछले साल इसी अवधि में यह **38%** था।
खर्च की रफ्तार में तेजी
वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों में सरकार का खर्च उम्मीद से कहीं ज्यादा रहा है। ₹16.96 लाख करोड़ के कुल सालाना लक्ष्य के मुकाबले सरकार पहले ही ₹7.10 लाख करोड़ खर्च कर चुकी है। सरकारी डेटा के मुताबिक, खर्च में यह तेजी मुख्य रूप से सब्सिडी के मोर्चे पर हुई भारी निकासी के कारण आई है।
सब्सिडी का बढ़ता बोझ
सब्सिडी बिल में पिछले साल के मुकाबले 24.4% का बड़ा उछाल आया है और यह ₹1.87 लाख करोड़ पर पहुंच गया है। इसमें:
- फूड सब्सिडी: ₹83,510 करोड़ (सालाना बजट का 37%)।
- यूरिया सब्सिडी: ₹77,522 करोड़ (सालाना बजट का 66%)।
सरकार ने कृषि और आवश्यक खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए इन खर्चों को 'फ्रंट-लोड' किया है।
इंफ्रा और उधारी का गणित
अच्छी खबर यह है कि सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना फोकस बरकरार रखा है। कैपिटल स्पेंडिंग सालाना बजट का 42% तक पहुंच गई है, जो पिछले साल 39% थी। हालांकि, इस खर्च को पूरा करने के लिए सरकार ने अगस्त तक ₹5.30 लाख करोड़ की उधारी ली है, जो पूरे साल की योजना का 41% है। इसके अलावा, स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स के जरिए भी ₹1.12 लाख करोड़ जुटाए गए हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
बाजार के जानकारों का मानना है कि राजकोषीय घाटे में यह तेज उछाल बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों पर दबाव बना सकता है। अगर सरकार की उधारी की रफ्तार इसी तरह रही, तो बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी और बॉन्ड यील्ड प्रभावित हो सकती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या सरकार बाकी बचे महीनों में खर्चों को बजट सीमा के भीतर रखती है या फिर अपने उधारी कैलेंडर में बदलाव करती है।
