भारत में साल **2028** तक **$128 बिलियन** का एक बड़ा इंटर-जेनरेशनल वेल्थ ट्रांसफर (Inter-generational wealth transfer) होने वाला है। साथ ही, कॉर्पोरेट जगत में CSR का खर्च भी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जो आने वाले दशक में **₹1 ट्रिलियन** के स्तर को छू सकता है।
बदलती आर्थिक तस्वीर और वेल्थ का प्रवाह
भारत एक महत्वपूर्ण आर्थिक दौर से गुजर रहा है जहाँ दो बड़ी लिक्विडिटी ट्रेंड्स सामाजिक विकास के लिए कैपिटल एलोकेशन को पूरी तरह बदल रही हैं। साल 2018 से 2028 के बीच भारत में $128 बिलियन की संपत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होने का अनुमान है। यह पूंजी का बड़ा प्रवाह आने वाले समय में इंस्टीट्यूशनल फिलैंथ्रोपी (Philanthropy) और सोशल इंपैक्ट इन्वेस्टमेंट के लिए एक नई नींव तैयार कर रहा है।
CSR: अब कंपनियों का एक बड़ा खर्च
रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत, भारत की मुनाफे वाली कंपनियों के लिए अपनी कमाई का एक हिस्सा CSR गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य है। वर्तमान में यह अनिवार्य खर्च ₹40,000 करोड़ सालाना से अधिक है, और अनुमान है कि अगले 10 सालों में यह आंकड़ा ₹1 ट्रिलियन के पार पहुंच सकता है। इससे CSR अब भारतीय बिजनेस के लिए एक स्थायी और महत्वपूर्ण कॉस्ट कंपोनेंट बन गया है।
प्रोफेशनल मैनेजमेंट और निवेशकों के लिए मायने
अब फैमिली ऑफिस और कॉर्पोरेट फाउंडेशन में फैसले लेने का तरीका बदल रहा है। पारंपरिक तरीकों की जगह अब डेटा-ड्रिवन और प्रोफेशनल अप्रोच ने ले ली है। निवेशकों के नजरिए से देखें, तो CSR अब केवल दिखावे का काम नहीं, बल्कि एक अनिवार्य खर्चा है जो कंपनी के बॉटम लाइन को प्रभावित करता है।
जो कंपनियां CSR के खर्चों को प्रोफेशनल तरीके से मैनेज करेंगी और सटीक परिणाम दिखाएंगी, उनकी ब्रांड वैल्यू और स्टेकहोल्डर रेपुटेशन बेहतर होगी। इसके विपरीत, इन नियमों का सही पालन न करना कंप्लायंस रिस्क और कैपिटल की बर्बादी के रूप में सामने आ सकता है, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी।
