India पर मंडराए दोहरे खतरे: US से व्यापारिक सख्ती और ईरान मामले से ऊर्जा संकट का डर

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AuthorAditya Rao|Published at:
India पर मंडराए दोहरे खतरे: US से व्यापारिक सख्ती और ईरान मामले से ऊर्जा संकट का डर

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव और मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के बीच, भारत अब अमेरिकी व्यापारिक नियमों की जांच के दायरे में भी आ गया है। इन सबके बीच, एक नई CAG रिपोर्ट ने 'ग्रीन इंडिया मिशन' में बड़ी खामियों का खुलासा किया है, जिससे आर्थिक और प्रशासनिक चिंताएं बढ़ गई हैं।

भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट

मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव गहराता जा रहा है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता नहीं बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अमेरिकी सीनेट द्वारा पारित 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' के तहत, जो देश रूस से कच्चा तेल और गैस का बड़ा आयात करेंगे, उन पर 100% तक का भारी टैरिफ (Tariff) लगाया जा सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है, ऐसे में यह स्थिति देश के ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू ईंधन की कीमतों को भी प्रभावित कर सकती है।

व्यापारिक जांच और बाजार पर असर

ऊर्जा के अलावा, अमेरिकी अधिकारी भारतीय निर्यातकों से उत्पादों की उत्पत्ति (Origin) के बारे में अधिक जानकारी मांग रहे हैं। हालांकि व्यापारिक जांच एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन बढ़ी हुई सख्ती भारतीय निर्यातकों के लिए एक अनिश्चितता का माहौल बना रही है, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं। इन वैश्विक और घरेलू चिंताओं का असर भारतीय शेयर बाजारों पर भी दिख रहा है। हाल ही में दो हफ्तों की तेजी के बाद Sensex और Nifty में गिरावट दर्ज की गई, जो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, संभावित व्यापारिक बाधाओं और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतिगत संकेतों को लेकर निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।

ग्रीन इंडिया मिशन में CAG की बड़ी खामियां

घरेलू मोर्चे पर, पर्यावरण से जुड़ी सरकारी पहलों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक परफॉरमेंस ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 'ग्रीन इंडिया मिशन' अपने लक्ष्यों को हासिल करने में बुरी तरह विफल रहा है। साल 2015-16 से 2024-25 के बीच, मिशन ने 1.4 मिलियन हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 0.034 मिलियन हेक्टेयर में ही वन क्षेत्र का विस्तार किया, जो कि 97% की बड़ी कमी है। इसी तरह, वन की गुणवत्ता सुधारने के लक्ष्य में भी 92% की कमी पाई गई। ऑडिट में वित्तीय प्रबंधन पर भी चिंता जताई गई है, जहां आवंटित राशि का केवल 47.88% ही जारी किया गया, जो योजना और प्रशासनिक क्रियान्वयन में बाधाओं का संकेत देता है।

अब निवेशक और नीति निर्माता इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि सरकार इन निष्कर्षों, विशेषकर फंडिंग और संचालन संबंधी कमियों को कैसे दूर करती है। अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध और ऊर्जा स्रोतों की स्थिरता महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु बने रहेंगे, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह का तनाव या व्यापार नीति में बदलाव भारत की आर्थिक वृद्धि और महंगाई के अनुमानों पर सीधा असर डाल सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.