फरवरी से अब तक ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में **50%** से ज्यादा का उछाल आया है। मिडिल ईस्ट और यूक्रेन में जारी तनाव के कारण सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जो भारत के लिए महंगाई और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) की नई चिंताएं खड़ी कर रही है।
ऊर्जा संकट और सरकारी खजाना
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए क्रूड ऑयल की कीमतों में कोई भी बड़ी हलचल सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था को हिला देती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि क्रूड के दाम में $1 की बढ़ोतरी से भारत के आयात बिल पर अरबों का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इससे न केवल करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है, बल्कि महंगाई भी बेकाबू होने का डर बना रहता है। सरकार के फाइनेंशियल प्लानिंग में भी अब अनिश्चितता बढ़ गई है।
कॉर्पोरेट मुनाफे पर मार
सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि कंपनियों के मार्जिन पर भी इसका असर दिख रहा है। ट्रांसपोर्ट, सीमेंट, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर, जो तेल पर निर्भर हैं, उनकी इनपुट कॉस्ट में बड़ा इजाफा हो रहा है। इससे आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है।
ग्लोबल सप्लाई चेन की समस्या
रेड सी (Red Sea) और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम रूट पर जारी तनाव ने सप्लाई को पूरी तरह बाधित कर दिया है। न्यूयॉर्क में चल रही 81वीं यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) में भी वैश्विक नेता इस संकट पर चर्चा कर रहे हैं। फिलहाल, निवेशक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि कब तक इन समुद्री रास्तों पर शांति बहाल होती है और क्या सरकार घरेलू ईंधन कीमतों में कोई बदलाव करती है।
