अगस्त की शुरुआत में FPIs ने ₹12,921 करोड़ से ज़्यादा का इनफ्लो किया, लेकिन 2.4% टैक्स का बोझ अभी भी एक बड़ी रुकावट बना हुआ है। निवेशक सरकारी कदमों को देख रहे हैं, पर इक्विटी टैक्स का मसला अभी सुलझा नहीं है।
FPIs का यू-टर्न: ₹12,921 करोड़ का इनफ्लो
साल 2026 के अगस्त महीने की शुरुआत में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय बाजार में वापसी की है। उन्होंने ₹12,921 करोड़ से ज़्यादा का नेट इनफ्लो दर्ज किया है। यह ऐसे समय में हुआ है जब साल की शुरुआत में FPIs ने करीब ₹2.41 लाख करोड़ का भारी बिकवाली की थी।
टैक्स का बोझ: रिटर्न पर कितना असर?
इस वापसी के बावजूद, भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों के लिए कारोबार करने की लागत एक बड़ी चिंता बनी हुई है। खास तौर पर, कैपिटल गेंस टैक्स (Capital Gains Tax) का मामला। एक अनुमान के मुताबिक, भारत का टैक्स ढांचा विदेशी निवेशकों के सालाना पोस्ट-टैक्स रिटर्न को लगभग 2.4% तक कम कर सकता है।
इसके अलावा, विदेशी फंड्स को हर दिन की Unrealized Gains पर टैक्स का एडवांस भुगतान करने की प्रशासनिक चुनौती का भी सामना करना पड़ता है। यह फंड्स के नेट एसेट वैल्यू (NAV) को प्रभावित करता है और उनके होम कंट्री में टैक्स क्रेडिट क्लेम करने की प्रक्रिया को जटिल बनाता है।
सरकार के कदम और आगे की चुनौतियां
विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए, भारतीय सरकार ने कुछ अहम सुधारों की घोषणा की है। 4 जून, 2026 को, यूनियन कैबिनेट ने सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) में निवेश पर FPIs के लिए कैपिटल गेंस और इंटरेस्ट इनकम टैक्स से छूट देने वाले एक अध्यादेश को मंजूरी दी। इसका मकसद भारतीय डेट मार्केट को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप लाना और पैसिव फॉरेन इनफ्लो को प्रोत्साहित करना था।
लेकिन, इक्विटी निवेश के लिए टैक्स का मसला अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है। अगस्त की शुरुआत में पेश किए गए 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' में डेटा सेंटर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में विदेशी निवेश के लिए प्रोत्साहन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, इक्विटी से जुड़ा कैपिटल गेंस टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) जैसी चीजें अभी भी एक स्ट्रक्चरल बाधा बनी हुई हैं।
बाजार के जानकार बताते हैं कि इन सब वजहों से भारत में ट्रेडिंग कई उभरते बाजारों की तुलना में महंगा हो जाता है। यह फंड मैनेजर्स के ग्लोबल पोर्टफोलियो में कैपिटल एलोकेशन को प्रभावित कर सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये स्ट्रक्चरल लागतें बाजार की लिक्विडिटी और मैक्रोइकोनॉमिक सेंटीमेंट के साथ कैसे इंटरैक्ट करती हैं। अगस्त के इनफ्लो भले ही विश्वास में सुधार दिखा रहे हों, लेकिन भारतीय इक्विटी की निरंतर आकर्षकता फंडामेंटल ग्रोथ और एक ऐसे टैक्स माहौल पर निर्भर करेगी जो ग्लोबल कैपिटल के लिए बाधाओं को कम करे। भविष्य में इक्विटी से जुड़े टैक्स को सरल बनाने या 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल' में किसी भी तरह के बदलाव को लेकर सरकार के अपडेट्स विदेशी संस्थागत सेंटीमेंट और बाजार की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे।
