वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा **€31.5 बिलियन** से बढ़ाकर **€310 बिलियन** तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह बड़ी छलांग मुख्य रूप से भारत-यूरोपीय संघ (EU) के बीच होने वाले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर टिकी है।
व्यापार का नया रोडमैप
सरकार इस डील को लेकर काफी आशावादी है। अगर दिसंबर तक भारत-EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हो जाते हैं, तो यह इंजीनियरिंग सर्विसेज, टेक्सटाइल और ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर के लिए बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह डील न केवल ट्रेड बैरियर्स को कम करेगी, बल्कि कस्टम्स की प्रक्रिया को भी आसान बनाएगी।
एक्सपोर्टर्स के सामने चुनौतियां
हालांकि, इस ग्रोथ की राह में यूरोपीय यूनियन का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) एक बड़ी रुकावट बन सकता है। इसके तहत स्टील, आयरन और एल्युमीनियम जैसे प्रोडक्ट्स पर कार्बन टैक्स लगाया जाएगा। इससे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स की लागत बढ़ सकती है और ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
मार्केट की नजर अब इस बात पर है कि किन कंपनियों का एक्सपोजर यूरोप में सबसे ज्यादा है। जो कंपनियां समय रहते कार्बन उत्सर्जन नियमों (Emission Standards) के अनुकूल खुद को ढाल लेंगी, उन्हें लॉन्ग टर्म में इस ट्रेड एग्रीमेंट का सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। निवेशकों को अब आधिकारिक समझौते और टैरिफ में कटौती की शर्तों का इंतजार रहेगा।
