भारत अब कच्चे कृषि उत्पादों के एक्सपोर्ट से आगे बढ़कर प्रोसेस्ड फूड ब्रांड्स बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। वित्त वर्ष 2024 में इस सेक्टर की वैल्यू एडिशन **₹2.24 लाख करोड़** तक पहुंच गई है, जिससे FMCG कंपनियों के लिए सप्लाई चेन और मुनाफे के नए रास्ते खुल रहे हैं।
भारत सरकार कृषि क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। अब लक्ष्य केवल कच्चा माल निर्यात करना नहीं, बल्कि भारत को ग्लोबल फूड ब्रांडिंग का हब बनाना है। केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने हाल ही में जानकारी दी कि इस सेक्टर का ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) वित्त वर्ष 2014-15 के ₹1.34 लाख करोड़ से बढ़कर 2023-24 में ₹2.24 लाख करोड़ हो गया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादों की बर्बादी को कम करना और किसानों के साथ-साथ कंपनियों को अधिक मुनाफा दिलाना है।
FMCG कंपनियों पर असर
निवेशकों के लिए यह विकास काफी अहम है क्योंकि इसका सीधा संबंध बड़ी FMCG कंपनियों के बिजनेस मॉडल से है। यदि कृषि उत्पाद सीधे सोर्स के पास प्रोसेस किए जाते हैं और कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होता है, तो कंपनियों को बेहतर क्वालिटी का कच्चा माल कम बर्बादी के साथ मिलता है। यह सप्लाई चेन को अधिक मैच्योर बनाता है, जो भविष्य में इन कंपनियों के मार्जिन में सुधार ला सकता है। साथ ही, ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स के जरिए स्थानीय ब्रांड्स अब शहरों में भी तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं।
सरकारी योजनाओं की भूमिका
इस ग्रोथ को 'प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना' जैसी पहलों से रफ्तार मिल रही है, जिसने अब तक 1,200 से ज्यादा प्रोजेक्ट्स को कोल्ड चेन क्षमता बढ़ाने के लिए सपोर्ट किया है। वहीं, 'प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना' असंगठित क्षेत्र को संगठित करने का काम कर रही है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में लगभग 50,000 लाभार्थियों को ट्रेनिंग दी गई है, जो यह दिखाता है कि ग्रामीण भारत मॉडर्न फूड इकोनॉमी में तेजी से शामिल हो रहा है।
रिस्क और बाजार की चुनौतियां
हालांकि प्रोसेसिंग इंडस्ट्री का विस्तार सकारात्मक है, लेकिन इसमें रिस्क भी कम नहीं हैं। यह सेक्टर कच्चे माल की कीमतों में होने वाली महंगाई के प्रति बेहद संवेदनशील है। अगर खराब मौसम या किसी बीमारी के चलते फसल आपूर्ति बाधित होती है, तो कंपनियों की इनपुट कॉस्ट बढ़ सकती है, जिसका दबाव उनके प्रॉफिट मार्जिन पर साफ दिखेगा। साथ ही, सूक्ष्म उद्यमों को राष्ट्रीय स्तर पर स्केल करना एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए भारी कैपिटल और मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की जरूरत होती है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में यह देखना होगा कि कंपनियां रॉ मटेरियल की लागत को कैसे मैनेज करती हैं और यह नई क्षमता रेवेन्यू ग्रोथ में कितनी कारगर साबित होती है।
