नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS समिट से पहले भारत ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर है। हॉर्मुज संकट के चलते इंपोर्ट बिल में **$22 बिलियन** की बढ़ोतरी ने सरकार को **₹84,084 करोड़** के 'समुद्र मंथन' प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए करीब 90% विदेशी तेल पर निर्भर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में चल रहे तनाव के कारण मार्च से अगस्त 2026 के बीच देश के फसिल फ्यूल इंपोर्ट बिल में लगभग $22 बिलियन का इजाफा हुआ है, जिससे व्यापार घाटे और महंगाई का दबाव बढ़ गया है।
सप्लायर डायवर्सिफिकेशन की रणनीति
पहले रिफाइनर्स रूसी कच्चे तेल पर निर्भर थे, लेकिन वहां भी सप्लाई में उतार-चढ़ाव देखा गया है। अब भारत ने अपने एनर्जी बास्केट को डायवर्सिफाई करना शुरू कर दिया है। अगस्त में वेनेजुएला से तेल आयात में 64% की जोरदार मासिक उछाल देखी गई है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
'समुद्र मंथन' से उम्मीदें
सरकार ने घरेलू प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए जुलाई 2026 में ₹84,084 करोड़ के 'समुद्र मंथन' नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को मंजूरी दी है। इस योजना का लक्ष्य डीप-वॉटर ऑयल और गैस भंडार विकसित करना है। हालांकि ये प्रोजेक्ट्स लंबी अवधि के हैं, लेकिन भविष्य में इंपोर्ट का बोझ कम करने के लिए यह एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
निवेशकों के लिए संकेत
मार्केट पार्टिसिपेंट्स इस पूरी स्थिति को बारीकी से देख रहे हैं। अधिक इंपोर्ट लागत से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और रिफाइनर्स के लिए रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का पालन करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। आगामी BRICS समिट में होने वाली बातचीत तय करेगी कि भारत लंबी अवधि के लिए स्थिर सप्लाई एग्रीमेंट्स हासिल कर पाता है या नहीं।
