भारत सरकार अपनी नेशनल कूलिंग पॉलिसी में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। 2030 तक डेटा सेंटर की क्षमता **12 GW** तक पहुंचने के लक्ष्य के साथ, अब AI डेटा सेंटर्स को भी इसके दायरे में लाया जाएगा, जिससे कंपनियों के ऑपरेटिंग कॉस्ट और तकनीक पर सीधा असर पड़ेगा।
भारत अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को जलवायु लक्ष्यों के साथ जोड़ने के लिए इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) में बड़े बदलाव करने जा रहा है। साल 2025 में 1.5 GW की क्षमता से शुरू होकर, यह सेक्टर 2030 तक 12 GW के बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि साल 2031-32 तक इन सेंटर्स की बिजली खपत 26.3 GW तक पहुंच सकती है, जो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कूलिंग सिस्टम पर बड़ा दबाव
AI हार्डवेयर की बढ़ती हीट को कंट्रोल करना आज सबसे बड़ी चुनौती है। वर्तमान में, डेटा सेंटर अपनी कुल बिजली का 30% से 50% हिस्सा केवल कूलिंग पर खर्च कर रहे हैं। सरकार अब ICAP में बदलाव कर इसे और सख्त बनाने पर विचार कर रही है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
अगर सरकार अनिवार्य 'पावर यूसेज इफेक्टिवनेस' (PUE) बेंचमार्क लागू करती है, तो इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर होगा:
- एडवांस्ड तकनीक को फायदा: जो कंपनियां 'लिक्विड कूलिंग' या 'इमर्शन कूलिंग' जैसी आधुनिक तकनीक अपना चुकी हैं, उन्हें बाजार में बढ़त मिलेगी।
- ऑपरेटिंग कॉस्ट: पुरानी तकनीक पर निर्भर रहने वाली कंपनियों को भारी निवेश करना पड़ सकता है, जिससे उनके मार्जिन पर दबाव दिखेगा।
- ESG का महत्व: अब कंपनियां उन राज्यों को प्राथमिकता देंगी जहां सौर ऊर्जा और पानी की पर्याप्त उपलब्धता है, ताकि लंबे समय में ऑपरेटिंग कॉस्ट कम की जा सके।
निवेशकों को अब सरकार के आगामी सर्कुलर्स पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि कौन सी कंपनी आने वाले समय में सस्टेनेबिलिटी और प्रॉफिटेबिलिटी के तालमेल को बेहतर तरीके से मैनेज कर पाती है।
