जून 2026 तक भारत का कुल विदेशी कर्ज बढ़कर **$778.2 बिलियन** हो गया है, जो मार्च के मुकाबले **$15.4 बिलियन** की बढ़ोतरी दर्शाता है। हालांकि डेट-टू-जीडीपी रेशियो **20.8%** पर बेहतर हुआ है, लेकिन शॉर्ट-टर्म डेट बढ़ने से लिक्विडिटी प्रेशर पर नजर रखने की जरूरत है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तिमाही में भारत के विदेशी कर्ज में तेजी देखने को मिली है। वैश्विक लिक्विडिटी और क्रेडिट पैटर्न में बदलाव के कारण यह आंकड़ा $778.2 बिलियन पर पहुंच गया है। अच्छी बात यह है कि देश का डेट-टू-जीडीपी रेशियो पिछली तिमाही के 20.9% से घटकर 20.8% पर आ गया है, जो यह संकेत देता है कि आर्थिक विकास की रफ्तार कर्ज के बोझ को संभालने में सक्षम है।
शॉर्ट-टर्म रिस्क और लिक्विडिटी
आंकड़ों पर गौर करें तो एक साल या उससे कम मैच्योरिटी वाले शॉर्ट-टर्म कर्ज का हिस्सा अब कुल कर्ज का 19.7% हो गया है, जो मार्च में 19.6% था। वहीं, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व के मुकाबले शॉर्ट-टर्म डेट का अनुपात बढ़कर 23% हो गया है, जो पहले 21.6% था। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी ऐतिहासिक रूप से प्रबंधनीय दायरे में है, लेकिन निवेशकों के लिए यह लिक्विडिटी प्रेशर का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
डॉलर का दबदबा और करेंसी इम्पैक्ट
भारत के कुल विदेशी कर्ज में 54.8% हिस्सा अमेरिकी डॉलर में है। इसके बाद रुपया-डिनोमिनेटेड डेट का हिस्सा 29.8% है, जबकि बाकी हिस्सेदारी जापानी येन, यूरो और एसडीआर में है। डॉलर के मुकाबले येन और यूरो में कमजोरी ने कुल कर्ज में $0.9 बिलियन का बफर प्रदान किया है, वरना यह बढ़ोतरी $16.4 बिलियन के करीब होती।
डेट सर्विसिंग और आउटलुक
कर्ज चुकाने की लागत (डेट सर्विसिंग कॉस्ट) वर्तमान प्राप्तियों के 5.6% पर स्थिर बनी हुई है, जो भारत की भुगतान क्षमता के लिए एक सकारात्मक संकेत है। फिलहाल बाजार की नजरें विदेशी मुद्रा भंडार के स्तर और भारतीय रुपये की स्थिरता पर टिकी रहेंगी, ताकि यह समझा जा सके कि बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में देश अपने विदेशी दायित्वों को कैसे मैनेज करता है।
