हॉर्मूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी तनाव के चलते भारतीय निर्यात पर भारी असर पड़ा है। फाइनेंशियल ईयर **2027** की पहली तिमाही में सात प्रमुख पश्चिमी एशियाई देशों को होने वाला एक्सपोर्ट **16.9%** गिरकर **$11.4 बिलियन** रह गया है, साथ ही एनर्जी इम्पोर्ट कॉस्ट भी **$14.4 बिलियन** बढ़ गई है।
भारत के सात प्रमुख पश्चिमी एशियाई व्यापारिक साझेदारों—बहरीन, कुवैत, ईरान, इराक, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात—के साथ व्यापार में बड़ी रुकावटें आई हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इन देशों को होने वाला एक्सपोर्ट पिछले साल के $13.7 बिलियन से घटकर $11.4 बिलियन पर आ गया है। इस तनाव का सबसे सीधा असर एक्सपोर्टर्स की जेब पर पड़ रहा है।
लॉजिस्टिक्स और मार्जिन पर दबाव
भू-राजनीतिक तनाव के कारण माल ढुलाई (Freight rates) में 50% तक का उछाल आया है और शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम भी आसमान छू रहे हैं। जो कंपनियां इन रूटों पर निर्भर हैं, उनके प्रॉफिट मार्जिन, जो आमतौर पर 5% से 10% के बीच होते हैं, पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा, बैंकिंग अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने पेमेंट और लिक्विडिटी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
एनर्जी सेक्टर और इकोनॉमी पर असर
एक्सपोर्ट्स के नुकसान के अलावा, ऊर्जा क्षेत्र पर भी भारी मार पड़ी है। मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत को जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) आयात के लिए $22 बिलियन की अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ी है। नेट एडिशनल कॉस्ट $14.4 बिलियन रही है, जो भारत की जीडीपी (GDP) का करीब 0.38% है। यह खर्च देश के करंट अकाउंट बैलेंस पर दबाव डाल रहा है और महंगाई का खतरा भी बढ़ा रहा है।
सेक्टर के हिसाब से असर
हर सेक्टर पर प्रभाव अलग-अलग रहा है। बासमती चावल और डायमंड जैसे क्षेत्रों में गिरावट देखी गई है, जबकि एल्युमीनियम वायर और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों जैसे सेक्टरों ने बेहतर लचीलापन दिखाया है। कई कंपनियां अब अपने सप्लाई चेन को दूसरे ग्लोबल बाजारों की तरफ मोड़ रही हैं, ताकि क्षेत्रीय नुकसान की भरपाई की जा सके। आने वाले महीनों में शिपिंग लागत और एनर्जी इम्पोर्ट प्राइस की निगरानी करना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी होगा।
