सरकार और सुप्रीम कोर्ट नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को सीमित करने पर विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, केवल **21.3%** युवा ही इन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं, ऐसे में जानकारों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध डिजिटल शिक्षा को नुकसान पहुँचा सकता है।
सुरक्षा बनाम डिजिटल पहुंच
सरकार और सुप्रीम कोर्ट बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और बढ़ती लत को लेकर गंभीर हैं। इस पर मंथन चल रहा है कि क्या पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए या फिर प्लेटफॉर्म्स को अधिक जवाबदेह बनाया जाए। कंपनियों के लिए यह बड़ा बदलाव साबित हो सकता है क्योंकि कड़े नियमों से कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) में इजाफा होगा।
कंपनियों पर असर
Meta, Alphabet और Snap जैसी दिग्गज टेक कंपनियों को अब सख्त एज वेरिफिकेशन (Age Verification) और कंटेंट मॉडरेशन पर ध्यान देना होगा। अगर सरकार कड़े कानून लागू करती है, तो इन कंपनियों को अपनी यूजर एक्विजिशन स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदलना पड़ सकता है।
चौंकाने वाले आंकड़े (IHDS-3 Report)
India Human Development Survey (IHDS-3) के ताजा आंकड़े हैरान करने वाले हैं। देश में मोबाइल फोन की पहुंच तो 95.1% तक है, लेकिन 13 से 16 साल के बच्चों में सोशल मीडिया का सक्रिय इस्तेमाल सिर्फ 21.3% है। विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर कोई सख्त नियम थोपा गया, तो ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के बच्चे डिजिटल शिक्षा के अवसरों से वंचित रह जाएंगे।
अगला कदम क्या होगा?
प्लेटफॉर्म्स पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय, एक्सपर्ट्स एल्गोरिदम में बदलाव और सेफ डिफॉल्ट सेटिंग जैसे विकल्पों पर जोर दे रहे हैं। टेक सेक्टर के लिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार सुरक्षा मानकों को लेकर क्या नीति अपनाती है, जो उनकी ग्रोथ और भविष्य की योजनाओं को तय करेगी।
