जनवरी 2025 से विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजारों से **₹4.74 लाख करोड़** से ज्यादा की निकासी की है। निवेशकों के बीच अब बहस छिड़ गई है कि क्या मौजूदा टैक्स स्ट्रक्चर निवेश की राह में बड़ा रोड़ा बन रहा है?
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की लगातार होती निकासी ने देश के टैक्स ढांचे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स अब यह आंकलन कर रहे हैं कि भारत में निवेश करने की 'लागत' (Total Cost) कितनी बढ़ चुकी है।
टैक्स का बोझ और निवेशकों की चिंता
वर्तमान में भारत में 12.5% लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स और 20% शॉर्ट-टर्म लेवी के साथ-साथ सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) भी वसूला जाता है। एक ग्लोबल पोर्टफोलियो मैनेजर के लिए, ये लेवी नेट रिटर्न को सीधे तौर पर कम कर देती हैं, जिससे सिंगापुर या हांगकांग जैसे कम टैक्स वाले बाजार अधिक आकर्षक विकल्प बन जाते हैं।
करेंसी रिस्क और बाजार का दबाव
सिर्फ टैक्स ही नहीं, बल्कि करेंसी की अस्थिरता भी विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ा सिरदर्द है। रुपये की गिरावट उनके मुनाफे को टैक्स कटने से पहले ही खा जाती है। इसके ऊपर बाजार का महंगा वैल्यूएशन निवेशकों को और अधिक सोचने पर मजबूर कर रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में कैपिटल गेन्स और STT से सरकार को लगभग ₹1.81 लाख करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ है। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह राजस्व की जरूरत और विदेशी पूंजी के प्रवाह के बीच तालमेल कैसे बैठाए।
नीतिगत विरोधाभास और भविष्य की राह
निवेशक अब सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) पर मिलने वाली टैक्स छूट और इक्विटी पर भारी टैक्स के बीच के अंतर को भी बारीकी से देख रहे हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक पूंजी को आकर्षित करना है, तो टैक्स की अनिश्चितता को दूर करना होगा। आने वाले समय में STT और कैपिटल गेन्स नियमों में किसी भी बदलाव पर बाजार की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि यही तय करेगा कि भारत का 'ग्रोथ स्टोरी' ग्लोबल फंड्स को कितना लुभा पाती है।
