भारत ने भारत-मॉरीशस टैक्स संधि के तहत 'प्रिंसिपल पर्पस टेस्ट' (PPT) को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है, जो **10 अगस्त, 2026** से प्रभावी है। अब केवल वही कंपनियां टैक्स लाभ का दावा कर सकेंगी जिनका कोई वास्तविक कमर्शियल आधार (Commercial Substance) होगा।
भारत सरकार ने भारत-मॉरीशस डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट (DTAA) में 'प्रिंसिपल पर्पस टेस्ट' (PPT) को शामिल कर लिया है। इस प्रोटोकॉल को 13 अक्टूबर, 2026 को भारत के राजपत्र (Gazette) में अधिसूचित किया गया, जो पीछे की तारीख यानी 10 अगस्त, 2026 से लागू माना जाएगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य टैक्स चोरी को रोकना और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप टैक्स फ्रेमवर्क को मजबूत करना है।
कैसे काम करेगा PPT?
यह टेस्ट टैक्स लाभों के लिए एक नए फिल्टर की तरह काम करेगा। अब भारतीय टैक्स अधिकारी यह जांच सकेंगे कि किसी ट्रांजेक्शन या बिजनेस स्ट्रक्चर का मुख्य उद्देश्य टैक्स बचाना तो नहीं था। यदि अथॉरिटीज को लगता है कि टैक्स लाभ लेना ही मुख्य कारण था, तो वे डिविडेंड या इंटरेस्ट पर मिलने वाली टैक्स छूट को खारिज कर सकती हैं।
निवेशकों पर असर और चुनौतियां
अब विदेशी निवेशकों, प्राइवेट इक्विटी फर्मों और वेंचर कैपिटल फंड्स को यह साबित करना होगा कि मॉरीशस में स्थित उनकी होल्डिंग कंपनियों के पास वास्तविक बिजनेस एक्टिविटी है। इसका मतलब है कि जिन कंपनियों के पास दफ्तर, कर्मचारी या कोई ऑपरेशनल आधार नहीं है (जिन्हें अक्सर शेल कंपनियां कहा जाता है), उन्हें सबसे ज्यादा खतरा है।
ग्रैंडफादरिंग और अनिश्चितता
राहत की बात यह है कि 1 अप्रैल, 2017 से पहले खरीदे गए शेयरों पर यह नियम लागू नहीं होगा। इन पुराने निवेशों को 'ग्रैंडफादरिंग' के तहत सुरक्षा मिली हुई है। हालांकि, मौजूदा बाजार सहभागियों के लिए कानूनी अनिश्चितता बढ़ सकती है क्योंकि 'प्रिंसिपल पर्पस' को परिभाषित करने के मामले में टैक्स अथॉरिटीज और निवेशकों के बीच विवाद हो सकता है।
अब बाजार की नजरें सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) की भविष्य की गाइडलाइंस पर टिकी हैं। जब तक रेगुलेटर की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं आते, तब तक मॉरीशस-आधारित स्ट्रक्चर वाले निवेशकों के लिए टैक्स एडवाइजरी के साथ अपने निवेश की समीक्षा करना बेहद जरूरी है।
