FY27 की दूसरी तिमाही में इंडिया के इंडस्ट्रियल सेक्टर ने मैन्युफैक्चरिंग और क्रेडिट ग्रोथ के दम पर मजबूत रफ्तार पकड़ी है। हालांकि, प्राइवेट कंजम्पशन में नरमी और बढ़ते फिस्कल दबाव ने दूसरी छमाही के लिए चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, साथ ही विदेशी निवेशकों की **$13.6 बिलियन** की निकासी ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
इंडस्ट्रियल सेक्टर का हाल
वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में भारतीय इकोनॉमी का इंडस्ट्रियल मोमेंटम काफी मजबूत रहा है। मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी और क्रेडिट ग्रोथ इस विस्तार के मुख्य इंजन बने हुए हैं। सितंबर में ऑटोमोबाइल सेक्टर की रिकॉर्ड रिटेल बिक्री यह साबित करती है कि फैक्ट्री एक्टिविटी ठोस जमीन पर टिकी है।
कंजम्पशन और रूरल डिमांड पर दबाव
इंडस्ट्रियल स्ट्रेंथ के बीच, कंज्यूमर डिमांड में गिरावट के संकेत साफ दिख रहे हैं। त्योहारी सीजन के बावजूद प्राइवेट कंजम्पशन का ढांचा बदल रहा है। GST के स्ट्रक्चरल बदलावों का असर अब कम हो रहा है, जिससे YoY ग्रोथ तुलना मुश्किल हो रही है। इसके अलावा, UPI ट्रांजेक्शन की ग्रोथ में भी सुस्ती देखी गई है। असमान मानसून की मार रूरल डिमांड पर भी पड़ी है, जबकि ऊंची ब्याज दरों ने हाउसली होल्ड स्पेंडिंग पर दबाव बना दिया है।
सरकारी खजाने और फिस्कल डेफिसिट
सरकार के लिए फिस्कल हेल्थ एक बड़ी चुनौती बन गई है। कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन में 20% की बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन इनडायरेक्ट टैक्स का प्रदर्शन कमजोर रहा है। फूड और फर्टिलाइजर सब्सिडी पर खर्च बढ़ने की वजह से चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में फिस्कल डेफिसिट बढ़ गया है। पूरे साल के टारगेट को मेंटेन करना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
RBI की पॉलिसी और विदेशी निवेश
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से पहली छमाही में $13.6 बिलियन की शुद्ध निकासी की है, जिसका मुख्य कारण ग्लोबल मार्केट में बॉन्ड यील्ड्स का बढ़ना है। वहीं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) महंगाई को काबू में रखने के लिए पूरी तरह फोकस है।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का रुख अपनाया है। इसका मतलब है कि महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए आगे भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद बनी हुई है। निवेशकों के लिए अब सरकार के फिस्कल डेफिसिट टारगेट, रूरल रिकवरी की रफ्तार और महंगाई दर की चाल पर नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है।
