भारत की आर्थिक रफ्तार में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जहाँ शहरी सेवाएं (Urban Services) मजबूती दिखा रही हैं, वहीं ग्रामीण मांग (Rural Demand) में सुस्ती के कारण इकॉनमी 'K-शेप्ड' पैटर्न की ओर बढ़ती दिख रही है। भले ही जीडीपी ग्रोथ **7.8%** पर स्थिर है, लेकिन कमजोर एक्सपोर्ट ऑर्डर और ग्रामीण वेतन का दबाव चिंता बढ़ा रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था का विस्तार अब एक अलग मोड़ पर है। HSBC के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में पॉजिटिव इकोनॉमिक इंडिकेटर्स 78% से गिरकर 67% पर आ गए हैं, जो बाजार में असंतुलित प्रदर्शन को दर्शाता है। हालांकि पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही, लेकिन फॉर्मल शहरी सेक्टर और ग्रामीण इकॉनमी के बीच की खाई गहरी होती जा रही है।
ग्रामीण भारत की चुनौती
ग्रामीण खपत (Rural Consumption) पर भारी दबाव है। खेती में सुस्ती और वास्तविक वेतन (Real Wage) में कोई खास बढ़ोतरी न होने से ट्रैक्टर सेल्स और नॉन-ड्यूरेबल गुड्स की बिक्री प्रभावित हुई है। इस जोखिम को देखते हुए कर्ज देने वाली संस्थाएं अब गोल्ड लोन जैसे सेगमेंट में काफी सतर्क हो गई हैं।
शहरी क्षेत्र में मजबूती
इसके उलट, शहरी भारत का दम बना हुआ है। अक्टूबर में सर्विसेज PMI 55.8 पर पहुंच गया, जो 4 महीने का उच्चतम स्तर है। मजबूत शहरी मांग के कारण संगठित रिटेल और प्रीमियम कंज्यूमर सेगमेंट का प्रदर्शन बेहतर बना हुआ है। इसे 'K-शेप्ड' रिकवरी कहा जा रहा है, जहां बड़े फॉर्मल बिजनेस, ग्रामीण कंज्यूमर पर निर्भर बिजनेस से बहुत आगे निकल गए हैं।
एक्सपोर्ट और भविष्य की चिंताएं
एक्सपोर्ट सेक्टर में भी अब सुस्ती के संकेत हैं। नए इंटरनेशनल ऑर्डर्स की रफ्तार पिछले 45 महीनों में सबसे धीमी है। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग सेक्टर बेहतर कर रहे हैं, लेकिन ग्लोबल अनिश्चितता ने माहौल को कठिन बना दिया है। फिलहाल सारा जोर सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च पर है, लेकिन व्यापक स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी में वह उत्साह अभी नहीं दिखा है।
