भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है! अब DGFT ने फॉरेन ट्रेड पॉलिसी (Foreign Trade Policy) में बदलाव किया है। इसके तहत, भारतीय रुपये (INR) में पेमेंट लेने वाले एक्सपोर्टर्स को भी अब सरकारी इंसेंटिव का लाभ मिलेगा। यह कदम अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और भारतीय कारोबारियों के लिए करेंसी रिस्क को कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
नई पॉलिसी का असर
भारतीय सरकार ने रुपये को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। फॉरेन ट्रेड पॉलिसी (FTP) 2023 में संशोधन करते हुए, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत, अब एक्सपोर्टर्स अपने माल और सेवाओं का बिल भारतीय रुपये में बना सकते हैं और इसके बावजूद वे सरकारी इंसेंटिव (incentives) के हकदार होंगे।
पहले क्या था नियम?
पहले के नियमों के मुताबिक, एक्सपोर्टर्स को फॉरेन ट्रेड पॉलिसी के तहत मिलने वाले फायदों का दावा करने के लिए अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी करेंसी में ही पेमेंट लेना ज़रूरी था। ऐसे में, जो एक्सपोर्टर रुपये में सौदा करते थे, वे अक्सर नुकसान में रहते थे क्योंकि वे इन ट्रांज़ैक्शन्स को अपनी एक्सपोर्ट ऑब्लिगेशन्स (export obligations) में शामिल नहीं कर पाते थे और न ही सरकारी इंसेंटिव का लाभ उठा पाते थे।
अब क्या होगा?
नए संशोधन के साथ, एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट (export contract) और पेमेंट के नियम फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट (Manner of Receipt and Payment) रेगुलेशन्स 2023 के अनुरूप हो गए हैं। अब योग्य Rupee पेमेंट्स को भी FTP बेनिफिट्स के लिए गिना जाएगा, जिससे रुपये में होने वाले निर्यात (export) को विदेशी करेंसी में होने वाले निर्यात के बराबर का दर्जा मिल गया है। यह उन देशों के लिए खास तौर पर फायदेमंद होगा जहाँ अमेरिकी डॉलर की कमी है। इसके अलावा, EXIM बैंक या सरकारी क्रेडिट लाइन्स से फाइनेंस होने वाले एक्सपोर्ट्स को भी अब रुपये में इनवॉइस (invoice) करने की अनुमति मिल गई है।
सामने आ सकती हैं ये दिक्कतें
हालांकि यह पॉलिसी एक रणनीतिक कदम है, लेकिन एक्सपोर्टर्स को कुछ व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यह पॉलिसी रुपये के इस्तेमाल को आसान बनाती है, लेकिन यह गारंटी नहीं देती कि विदेशी खरीदार आसानी से व्यापार के लिए यह करेंसी खरीद पाएंगे।
एक बड़ी चिंता यह है कि विदेशी बैंक बड़े Rupee बैलेंस रखने या ऐसे ट्रांज़ैक्शन्स को करने में हिचकिचा सकते हैं। चूंकि भारतीय रुपया पूरी तरह से कनवर्टिबल (convertible) नहीं है, इसलिए विदेशी बैंक इस करेंसी में लिक्विडिटी (liquidity) बनाए रखने से कतरा सकते हैं। अगर किसी विदेशी बैंक के पास Rupee ट्रांज़ैक्शन्स को मैनेज करने का इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) नहीं है, तो एक्सपोर्टर्स को पेमेंट मिलने में देरी या सेटलमेंट (settlement) में परेशानी हो सकती है। इसलिए, यह पॉलिसी एक्सपोर्टर्स के लिए करेंसी कन्वर्ज़न (currency conversion) की जरूरत और एक्सचेंज-रेट की अस्थिरता (exchange-rate volatility) को कम तो करती है, लेकिन इसका असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग पार्टनर्स (banking partners) इस बदलाव को कितनी जल्दी अपनाते हैं।
कुछ खास अपवाद
निवेशकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि यह पॉलिसी सभी व्यापारिक मार्गों पर लागू नहीं होती है। एशियन क्लियरिंग यूनियन (ACU) – जिसमें बांग्लादेश, ईरान और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं – के अपने नियम हैं जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा तय किए जाते हैं। इसके अलावा, नेपाल और भूटान के साथ व्यापार के लिए अलग नियम लागू होते हैं। इन क्षेत्रों के एक्सपोर्टर्स को नए नियमों के बजाय पुराने प्रोटोकॉल्स (protocols) का ही पालन करना होगा।
आने वाले समय में यह देखना होगा कि प्रमुख निर्यात बाजारों में बैंकिंग सपोर्ट का स्तर क्या रहता है। भारतीय कंपनियों के लिए, इस रूट का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वे ऐसे बैंकिंग पार्टनर्स ढूंढ पाते हैं जो बिना किसी बड़ी बाधा के Rupee-denominated ट्रेड कॉन्ट्रैक्ट्स को संभालने के लिए तैयार हों।
