सरकार ने मार्च 2027 तक के लिए HVAC कंपोनेंट्स जैसे कंप्रेशर और कॉपर ट्यूब के इंपोर्ट पर कोटा-आधारित राहत दी है। इस कदम से मैन्युफैक्चरिंग लागत कम होने की उम्मीद है और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव भी कम हो सकता है।
भारत सरकार ने हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स की किल्लत को देखते हुए एक रणनीतिक नीतिगत बदलाव किया है। इसका सीधा फायदा HVAC (हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग) सेक्टर को होगा। नए दिशानिर्देशों के तहत, कंपनियां अब मार्च 2027 तक सख्त कोटा और समय-सीमा के साथ जरूरी पार्ट्स जैसे इनर-ग्रूव्ड कॉपर ट्यूब और कंप्रेशर का इंपोर्ट कर सकेंगी।
यह फैसला मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए राहत भरा है, जो पिछले कुछ समय से ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) की कठोर प्रक्रियाओं और सप्लाई चेन की बाधाओं से जूझ रही थीं।
मुनाफे पर क्या होगा असर?
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के लिए कच्चे माल की बढ़ती कीमतें एक बड़ी चुनौती रही हैं। उदाहरण के तौर पर, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में Blue Star का रेवेन्यू 13.3% बढ़कर ₹3,377.92 करोड़ रहा, लेकिन ऑपरेटिंग मार्जिन पिछले साल के 6.7% से गिरकर 5.2% पर आ गया। इसकी मुख्य वजह इनपुट कॉस्ट का बढ़ना था, जिसे कंपनियां पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल सकीं।
अब नई छूट के तहत, कंपनियां अपने पिछले दो साल (FY25 और FY26) के औसत वॉल्यूम का 50% तक कॉपर ट्यूब इंपोर्ट कर सकेंगी। वहीं, रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर के कंप्रेशर के लिए यह सीमा क्रमशः 40% और 30% तय की गई है।
भविष्य की चुनौतियां और रिस्क
निवेशकों को यह याद रखना चाहिए कि यह राहत एक अस्थायी और कोटा-आधारित उपाय है। जब तक घरेलू स्तर पर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग चीन और ताइवान जैसे ग्लोबल हब के मुकाबले क्वालिटी और प्राइस में सक्षम नहीं हो जाती, तब तक निर्भरता बनी रहेगी। इसके अलावा, कॉपर की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मैक्रो-इकोनॉमिक दबाव भी सेक्टर के लिए रिस्क बने रहेंगे। आने वाली तिमाहियों में इन नतीजों पर नजर रखना जरूरी होगा कि क्या यह राहत मार्जिन को वाकई स्थिर कर पाती है।
