भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर मुहर लगने का रास्ता साफ हो गया है। दिसंबर 2026 में होने वाला यह ऐतिहासिक समझौता ट्रेड वैल्यू के **97%** हिस्से को कवर करेगा, जिससे इंजीनियरिंग, डिफेंस और टेक्नोलॉजी सेक्टर को बड़ा बूस्ट मिलने की उम्मीद है।
जनवरी 2026 में बातचीत पूरी होने के बाद, भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट अब अंतिम चरण में है। यह समझौता केवल एक व्यापारिक करार नहीं, बल्कि एक बड़ा मैक्रो-इकोनॉमिक माइलस्टोन है जो देश के कई प्रमुख सेक्टरों की तस्वीर बदल सकता है।
सेक्टर में बड़ा बदलाव और निवेश की लहर
यह डील ट्रेड वैल्यू के लगभग 97% हिस्से को कवर करती है, जिससे भारतीय निर्यातकों को ग्लोबल मार्केट में और अधिक कॉम्पिटिटिव बनने में मदद मिलेगी। खास बात यह है कि अब विदेशी कंपनियां, विशेष रूप से चेक रिपब्लिक की फर्म्स, केवल एक्सपोर्ट तक सीमित न रहकर भारत में जॉइंट वेंचर और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने पर विचार कर रही हैं। 'मेक इन इंडिया' के तहत डिफेंस, कंस्ट्रक्शन और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश आने की संभावना है।
निवेशकों के लिए रेगुलेटरी संकेत
हालांकि डील पर हस्ताक्षर दिसंबर में होंगे, लेकिन इसका ऑपरेशनल फेज 2027 से शुरू होगा। निवेशकों को यह ध्यान रखना होगा कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की संसद में मंजूरी मिलना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है। इसके अलावा, डिजिटल और IT एक्सपोर्टर्स के लिए डेटा प्रोटेक्शन, AI स्टैंडर्ड्स और सॉफ्टवेयर सोर्स कोड जैसे रेगुलेटरी नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण होगा। ये नियम सीधे तौर पर कंपनियों की अनुपालन लागत (Compliance Cost) को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल, बाजार की नजरें दिसंबर में होने वाली औपचारिक साइनिंग और उसके बाद 2027 की टाइमलाइन पर टिकी हैं।
