यूरोपीय आयोग (European Commission) ने इंडिया-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को काउंसिल की मंजूरी के लिए आधिकारिक रूप से सौंप दिया है। इस डील के तहत यूरोपीय ऑटोमोबाइल और कृषि उत्पादों के लिए खास इंपोर्ट कोटा तय किए गए हैं।
यूरोपीय आयोग ने 11 सितंबर 2026 को भारत के साथ प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के ड्राफ्ट को काउंसिल ऑफ द यूरोपियन यूनियन के पास मंजूरी के लिए भेज दिया है। यह एग्रीमेंट भारत के ऑटो और एग्री सेक्टर की प्रतिस्पर्धी गतिशीलता (competitive dynamics) को पूरी तरह बदल सकता है।
ऑटो सेक्टर के लिए नए नियम
भारतीय ऑटो बाजार के लिए सबसे बड़ा बदलाव 'टैरिफ-रेट कोटा' (TRQ) सिस्टम है। इसके तहत, यूरोप में बनी गाड़ियां अब भारत आ सकेंगी। पहले साल में 100,000 यूनिट्स के लिए प्रेफरेंशियल टैक्स रेट लागू होंगे, जो 10वें साल तक बढ़कर 160,000 यूनिट्स तक पहुंच जाएंगे।
यह राहत केवल उन वाहनों के लिए है जिनकी वैल्यू €15,000 से अधिक है। इसका मतलब है कि मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स जैसे मास-मार्केट लीडर्स पर इसका सीधा असर कम होगा, क्योंकि यह मुकाबला प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट तक सीमित रहेगा। €15,000 से €35,000 की रेंज वाली कारों पर इंपोर्ट ड्यूटी 110% से घटाकर 35% तक करने की योजना है।
कृषि उत्पादों का गणित
एग्री सेक्टर में सेब, पोर्क और कीवी जैसे उत्पादों के लिए खास नियम बनाए गए हैं। स्थानीय किसानों के हितों की रक्षा के लिए 'प्राइस फ्लोर' का सहारा लिया गया है। उदाहरण के लिए, 50,000 टन सेब के कोटे पर लोअर ड्यूटी तभी मिलेगी, जब उनकी कीमत कम से कम ₹80 प्रति किलोग्राम हो।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालांकि यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन डील अभी लागू नहीं हुई है। इसे अभी काउंसिल और संबंधित विधायी निकायों की अंतिम मंजूरी की जरूरत है। निवेशकों को सलाह है कि वे सरकारी नोटिफिकेशन पर नजर रखें और कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री का इंतजार करें, क्योंकि आने वाले समय में प्रीमियम सेगमेंट में कंपनियों को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
