भारत और यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन और जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स (GI) समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। इसका मकसद भारत में काम कर रही **6,000** से ज्यादा यूरोपियन कंपनियों के निवेश को सुरक्षा देना है। इस फ्रेमवर्क को **दिसंबर 2026** तक फाइनल करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे **2027** की शुरुआत तक एक बड़े ट्रेड डील का रास्ता साफ हो सके।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य उन 6,000 यूरोपियन कंपनियों के लिए एक सुरक्षित वातावरण तैयार करना है जो पहले से ही भारतीय बाजार में सक्रिय हैं। सरकार का लक्ष्य इस फ्रेमवर्क को दिसंबर 2026 तक अंतिम रूप देने का है, ताकि मार्च-अप्रैल 2027 तक इसे पूरी तरह लागू किया जा सके।
निवेशकों के लिए क्यों है यह खास?
विदेशी निवेशकों के लिए यह एग्रीमेंट एक बड़े सुरक्षा कवच की तरह है। यह विवाद समाधान (Dispute Resolution) के लिए स्पष्ट नियम तय करेगा और भेदभावपूर्ण व्यवहार को रोकेगा। इससे पॉलिसी संबंधी अनिश्चितताएं कम होंगी और भारत यूरोपियन पूंजी के लिए एक अधिक आकर्षक डेस्टिनेशन बनेगा।
GI एग्रीमेंट से ब्रांड्स को सुरक्षा
निवेश सुरक्षा के अलावा, सरकार जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स (GI) एग्रीमेंट पर भी काम कर रही है। यह समझौता भारत के प्रमुख उत्पादों जैसे 'दार्जिलिंग टी' और 'बासमती चावल' को यूरोपियन बाजारों में नकल से बचाएगा। वहीं, भारत में यूरोप के खास रीजनल प्रोडक्ट्स (जैसे कुछ विशेष चीज) को भी लीगल प्रोटेक्शन मिलेगा। यह म्युचुअल रिकग्निशन ब्रांड की वैल्यू और प्राइजिंग पावर बनाए रखने में मदद करेगा।
चुनौतियों का सामना
हालांकि, भारत और EU के बीच व्यापार वार्ता का इतिहास जटिल रहा है। नियामक मानकों, मार्केट एक्सेस और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी जैसे मुद्दों पर मतभेदों के कारण पहले भी देरी देखने को मिली है। ट्रेड डील की सफलता पूरी तरह से दोनों पक्षों की आम सहमति पर टिकी है। फिलहाल, निवेशकों की नजर दिसंबर में होने वाली अगली दौर की बातचीत पर टिकी है, जिससे इस बड़े समझौते की रूपरेखा और स्पष्ट हो पाएगी।
