India-EU FTA: जर्मनी की मध्यम दर्जे की कंपनियां अब भारत में लगाएंगी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India-EU FTA: जर्मनी की मध्यम दर्जे की कंपनियां अब भारत में लगाएंगी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट

जनवरी 2026 में हुए ट्रेड पैक्ट के बाद जर्मन कंपनियां भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित करने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि 97% सामान पर टैरिफ कम हो गया है, लेकिन वीजा और रेगुलेटरी चुनौतियां अभी भी बड़ी बाधा बनी हुई हैं।

जनवरी 27, 2026 को साइन हुआ इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अब भारत में काम कर रही जर्मन कंपनियों की बिजनेस रणनीति को पूरी तरह बदल रहा है। बेंगलुरु में हुए इंडो-जर्मन इंजीनियरिंग समिट में इंडस्ट्री लीडर्स ने साफ कहा कि यह समझौता केवल टैक्स में कटौती नहीं है, बल्कि यह जर्मन कंपनियों के लिए दक्षिण एशिया में अपनी लंबे समय की मौजूदगी को फिर से तय करने का एक बड़ा संकेत है।

'मिटेलस्टैंड' (Mittelstand) कंपनियों पर जोर

समिट का मुख्य आकर्षण 'मिटेलस्टैंड' कंपनियां रहीं, जो जर्मनी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मिड-साइज फैमिली कंपनियां हैं। अब इन कंपनियों को एक्सपोर्ट के बजाय भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका मकसद भारत के इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम की उन कमियों को दूर करना है, जहां हाई-टेक असेंबली के लिए अभी भी इम्पोर्टेड पार्ट्स पर निर्भर रहना पड़ता है। इस कदम से कंपनियां लॉजिस्टिक्स और शिपिंग की अस्थिरता से खुद को बचा पाएंगी।

राह में अभी भी हैं चुनौतियां

ट्रेड डील ने व्यापारिक बाधाएं तो हटाई हैं, लेकिन समिट में मौजूद एग्जीक्यूटिव्स ने चेताया कि भारत में बड़े पैमाने पर काम शुरू करना अभी भी जटिल है। लेबर रेगुलेशंस, प्रोजेक्ट क्लीयरेंस की लंबी प्रक्रिया और विदेशी एक्सपर्ट्स के लिए वीजा मिलने में होने वाली दिक्कतें इन मझोली कंपनियों के लिए 'डील-ब्रेकर' साबित हो सकती हैं। बड़ी कंपनियों के पास तो लीगल टीम होती है, लेकिन छोटी कंपनियों के लिए ये चुनौतियां ज्यादा बड़ी हैं।

निवेशकों के लिए क्या है खास?

अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार एंट्री प्रोसेस को आसान बनाती है और इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन नियमों को साफ करती है। एग्रीमेंट में 97% गुड्स, जिसमें मशीनरी, केमिकल्स और ऑटोमोटिव पार्ट्स शामिल हैं, से टैरिफ खत्म किया गया है। अब असली इम्पैक्ट तभी दिखेगा जब कंपनियां नई परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर अपना कैपिटल निवेश करेंगी। आने वाली तिमाहियों में इन जर्मन कंपनियों द्वारा घोषित किए जाने वाले नए इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स की रफ्तार ही बताएगी कि यह ट्रेड पैक्ट कितनी सफलतापूर्वक जमीन पर उतरा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.