भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच दिसंबर 2026 में होने वाले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के लिए कस्टम नियमों पर बातचीत तेज हो गई है। इसका मुख्य उद्देश्य एक्सपोर्टर्स के लिए ट्रांजैक्शन कॉस्ट को कम करना है, हालांकि घरेलू कंपनियों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
ब्रसेल्स में भारत और यूरोपीय आयोग के अधिकारियों के बीच कस्टम प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए चर्चा तेज हो गई है। जनवरी 2026 में बातचीत पूरी होने के बाद, अब दोनों पक्ष इस डील को दिसंबर 2026 के मध्य में औपचारिक रूप से साइन करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इस एग्रीमेंट के 2027 की शुरुआत से प्रभावी होने की उम्मीद है।
एक्सपोर्टर्स के लिए अवसर
इस FTA का सबसे बड़ा फायदा भारतीय एक्सपोर्टर्स को मिलेगा। टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर और जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे सेक्टर, जिन्हें मार्जिन का काफी दबाव रहता है, अब यूरोपीय बाजार में ड्यूटी-फ्री एक्सेस पा सकेंगे। इसके अलावा, मुंबई और सूरत से एंटवर्प (Antwerp) तक डायमंड सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए नई सर्टिफिकेशन और ट्रेसिबिलिटी मानक तय किए जा रहे हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम और चेतावनी
निवेशकों को इस डील को दोतरफा नजरिए से देखना चाहिए। जहाँ एक्सपोर्ट ओरिएंटेड कंपनियों को लाभ होगा, वहीं ऑटोमोबाइल, डेयरी और वाइन जैसे सेक्टर, जिन्हें अभी तक ऊंचे टैरिफ का संरक्षण मिलता था, उन्हें यूरोपीय इम्पोर्ट्स से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ सकता है। इन सेक्टर्स में आने वाली कंपनियों को अपनी कॉस्ट एफिशिएंसी और क्वालिटी पर अधिक ध्यान देना होगा।
फिलहाल, अभी एडमिनिस्ट्रेटिव और कानूनी प्रक्रिया का दौर जारी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दिसंबर में होने वाली साइनिंग के बाद कोई तकनीकी देरी तो नहीं होती है।
