कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने नई EPF स्कीम 2026 लागू कर दी है। इस नए नियम के तहत, इंटरनेशनल वर्कर्स (IWs) को अब अपनी पूरी सैलरी पर प्रॉविडेंट फंड (PF) का योगदान देना होगा, यानी ₹15,000 की पुरानी वेज कैप खत्म हो गई है। इससे मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) के लिए पेरोल कॉस्ट बढ़ जाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन नियमों को बरकरार रखा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी भी जारी है।
इंटरनेशनल वर्कर्स को झटका, कंपनियों पर बढ़ा बोझ
1 जुलाई 2026 से लागू हुई नई EPF स्कीम 2026 ने इंटरनेशनल वर्कर्स (IWs) के लिए नियम स्पष्ट कर दिए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब IWs को अपनी पूरी सैलरी पर पीएफ का योगदान देना होगा। पहले जहां ₹15,000 प्रति माह की कैप लागू थी, उसे अब पूरी तरह हटा दिया गया है।
कौन हैं इंटरनेशनल वर्कर्स?
आम तौर पर, इंटरनेशनल वर्कर वह भारतीय कर्मचारी होता है जिसे भारत के किसी द्विपक्षीय सोशल सिक्योरिटी एग्रीमेंट (SSA) वाले देश में भेजा गया हो, या फिर कोई विदेशी नागरिक जो भारत में काम कर रहा हो। नेपाल और भूटान के नागरिक इस श्रेणी से बाहर हैं और उन्हें सामान्य घरेलू कर्मचारियों की तरह माना जाता है। कर्मचारी के पासपोर्ट और कार्यस्थल के आधार पर वर्गीकरण तय होता है, न कि वीज़ा या रुकने की अवधि पर।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
इंटरनेशनल वर्कर्स के लिए वेज कैप हटने से मल्टीनेशनल कंपनियों के बजट पर सीधा असर पड़ेगा। चूंकि पीएफ का योगदान अब पूरी सैलरी पर होगा, जो कि ₹15,000 कैप से कहीं ज़्यादा होती है, इसलिए कंपनियों को अपने कुल वेतन बिल का ज़्यादा हिस्सा पीएफ में डालना होगा। जिन कंपनियों में विदेशी कर्मचारियों की संख्या ज़्यादा है, उनके लिए यह एक बड़ा वित्तीय बोझ है। हालांकि, नए स्कीम से ई-फाइलिंग के ज़रिए अनुपालन आसान हुआ है, लेकिन कंपनी की देनदारी बढ़ गई है।
कानूनी पेंच अभी भी बाकी
यह नियम भले ही लागू हो गए हों, लेकिन ये सालों से विवाद का विषय रहे हैं। LG Electronics जैसी कई मल्टीनेशनल कंपनियों ने कोर्ट में इन नियमों को चुनौती दी थी, उनका कहना था कि यह उन पर अनुचित वित्तीय बोझ डाल रहा है। नवंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इन नियमों की संवैधानिकता को सही ठहराया था। लेकिन, कंपनियों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इसलिए, फिलहाल नियम लागू हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से अनिश्चितता बनी हुई है।
निकासी और अनुपालन के जोखिम
पैसे निकालने के नियम भी अहम हैं। SSA वाले देशों के कर्मचारी खास शर्तों पर अपने पीएफ फंड को ट्रांसफर या निकाल सकते हैं। वहीं, नॉन-SSA देशों के कर्मचारियों के लिए नियम कड़े हैं, और वे आमतौर पर रिटायरमेंट या स्थायी विकलांगता की स्थिति में ही निकाल पाते हैं। अगर कंपनियां IWs के लिए सही रिकॉर्ड नहीं रखतीं या पूरा योगदान नहीं करतीं, तो उन्हें जुर्माने और जांच का सामना करना पड़ सकता है। निवेशकों और फाइनेंस मैनेजर्स को EPFO से आने वाले किसी भी नए स्पष्टीकरण या सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नज़र रखनी चाहिए।
