भारत और EFTA (यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ) अपने ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा अक्टूबर में करेंगे। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही में भारतीय एक्सपोर्ट में **22.72%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते यह मीटिंग बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत और EFTA के चार सदस्य देशों—स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन—के बीच ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) की एक उच्च-स्तरीय समीक्षा अक्टूबर में दिल्ली में होने जा रही है। यह एग्रीमेंट 1 अक्टूबर, 2025 से लागू हुआ था, लेकिन अब तक यह एक्सपोर्ट वॉल्यूम को उम्मीद के मुताबिक बढ़ाने में नाकाम रहा है।
एक्सपोर्ट में गिरावट का दौर
फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय एक्सपोर्ट में 22.72% की गिरावट आई है, जो कि $461.64 मिलियन के स्तर पर सिमट गया है। इससे पहले के फाइनेंशियल ईयर में भी एक्सपोर्ट में 10.77% की कमी देखी गई थी। हालांकि डील के तहत केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों के लिए 92.2% टैरिफ लाइन्स खोली गई थीं, फिर भी बिक्री में तेजी नहीं आई है।
बाधाएं क्या हैं?
वाणिज्य विभाग एक्सपोर्टर्स के साथ मिलकर इन समस्याओं की जड़ तलाश रहा है। सबसे बड़ी चुनौती 'रूल्स-ऑफ-ओरिजिन' के कड़े नियम हैं, जिसके तहत कंपनियों को भारी-भरकम कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। इसके अलावा, जटिल सर्टिफिकेशन प्रक्रिया और बॉर्डर पर होने वाली कस्टम्स देरी के कारण भारतीय व्यापारी टैरिफ छूट का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
निवेश का वादा और आगे की राह
इस पार्टनरशिप के तहत EFTA देशों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में $100 बिलियन के निवेश का वादा किया है। आगामी मीटिंग में रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट्स को सरल बनाने पर जोर दिया जाएगा, ताकि निवेश और व्यापार दोनों को गति मिल सके। निवेशकों और कारोबारियों के लिए इस अक्टूबर की बैठक के नतीजे बहुत अहम होंगे, क्योंकि इसी से तय होगा कि भारतीय एक्सपोर्टर्स इन बाजारों का सही फायदा उठा पाएंगे या नहीं।
